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जब पति ग्यारहवीं संतान और पत्नी बेटी बन जाए

Tue, 24 Sep 2013 12:19 PM IST
अमर उजाला, दिल्ली
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विवाह के समय पढ़े जाने वाले मंत्रों में एक सूर्या सावित्री मंत्र है जिसे प्रार्थना या ऋषि का आशीर्वाद कहा गया है। इस मंत्र का अर्थ है यह वधू दस संतानों की मां बने और इसका पति इसकी ग्यारहवीं संतान हो। ऋग्वेद के इस सूक्त में सैंतालीस मंत्र है। पति को पुत्र रूप में पा लेने की प्रार्थना यौन भावना के मुक्ति का प्रतीक है।
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मंत्र में ऋषि सावित्री सूर्या ने गाया है- दशास्यां पुत्रनाधेहि पतिमेकादशम कृधि (10।85।45)। हांलाकि इस मंत्र का अर्थ कुछ लोगों ने ज्यादा संतान के लिए जरूरी हुआ तोन नियोग आदि का सहारा लेने के रूप में भी किया है। लेकिन स्वीडन में लार्जर फैमिली आंदोलन के मनीषी स्टुअर्ट हेल का कहना है कि परिवार संस्था में सुखद और प्रेमल स्थितियां यौन भावना के मुक्ति से ही आती है।

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उनके अनुसार दस संतानों का अर्थ किसी स्त्री द्वारा जन्म दिए बच्चों से नहीं है। आशय ममता के इस विस्तार से है कि स्त्री दस यानी संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को स्नेह और दुलार दे सके। इस अभ्यास को वह पति तक, उसके बच्चों के पिता तक भी फैला सके तो ग्यारहवीं संतान अमैथुनी हो सकती है।
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स्टुअर्ट हेल महाभारत में लोमश ऋषि के प्रकरण का उल्लेख करते हैं। उस प्रकरण में पति को स्त्री के अभिभावक, पालक और संरक्षक रूप में देखा गया है। उस प्रसंग में ऋग्वेद के उक्त मंत्र को पुरुष, वर के साथ जोड़ा गया है।

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लोमश ऋषि कहते हैं कि पति जब अपनी पत्नी के देखभाल को पुत्री की तरह करने लगे, रति प्रसंगों में उनकी कोई रुचि न रहे, पुरुष के लिए सभी स्त्रियां मां या पुत्री की तरह हो जाए तो समझना चाहिए कि यौन भावना परिपक्व हो गई है।
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