ऐसा क्यों है कि जब तक सात फेरे पूरे नहीं हो जाते, तब तक विवाह संस्कार पूरा हुआ नहीं माना जाता। न एक फेरा कम, न एक फेरा ज्यादा- पूरे सात फेरे।
वैसे इन दिनों कुछ विवाह संस्कार आयोजनों में चार या पांच फेरों में ही काम चला लिया जाता है, लेकिन जानकारों के अनुसार इस तरह के संस्कार सुखद नहीं होते। इस विषय में जानकारों का कहना है।
सात की संख्या का क्या है राज?
पंडित गिरिधर शर्मा और डा. सच्चिदानंद मिश्र सप्तपदी के विषय में कहते हैं कि इसका असल उद्देश्य वरवधू को चेतना के हर स्तर पर एकरस और सामंजस्य से संपन्न कर देना है। चेतना के सात स्तरों की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि सात की संख्या मानव जीवन के लिए बहुत विशिष्ट है।
यज्ञ और संस्कार के वातावरण और विशिष्ट जनों की उपस्थिति में सात कदम एक साथ सातवें पद या परिक्रमा में वर, कन्या एक दूसरे से कहते है हम दोनों अब परस्पर सखा बन गए हैं।'' योग की दृष्टि से शरीर में ऊर्जा (पार्थिव) और शक्ति (आध्यात्मिकता) के सात केंद्र हैं। इन्हें चक्र कहा जाता है।
शरीर में मौजूद चक्र से सप्तपदी का संबंध
शरीर के निचले भाग से शुरु हो कर ऊपर की ओर बढने पर इनकी स्थिति इस प्रकार मानी गई है मूलाधार, (शरीर के प्रारंभिक बिंदु पर) स्वाधिष्ठान, ( गुदास्थान से कुछ ऊपर) मणिपुर, (नाभिकेंद्र) अनाहत, (हृदय) विशुद्ध, (कंठ) आज्ञा (ललाट, दोनों नेत्रों के मध्य में) और सहस्रार(शीर्ष भाग में जहां शिखा केंद्र) है।
चक्र शरीर के केंद्र हैं। उन्ही की तरह शरीर के भी सात स्तर माने गए हैं। इनके नाम इस तरह हैं स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर, मानस शरीर, आत्मिक शरीर, दिव्य शरीर और ब्रह्म शरीर। फिलहाल प्रत्यक्ष या स्थूल शरीर ही आंखों से देखा जाता है। इसके भीतर के अवयव छूकर या दूसरी प्रकार से जाने जाते है।
सत कदम चलने से सात जन्म का साथ
विवाह की सप्तपदी में उन शक्ति केंद्रों और अस्तित्व की परतों या शरीर के गहनतम रूपों तक तादात्म्य कायम करने का विधान रचा जाता है, केवल शिक्षा नहीं, व्यावहारिक विज्ञान के रूप में।
इस तथ्य को समझाने के लिए ही सप्तपदी या सात वचनों को संगीत के सात सुर, इंद्रधनुष के सात रंग, सात तल, सात समंदर, सात ऋषि, सातों लोकों आदि का उल्लेख किया जाता है। असल बात शरीर, मन और आत्मा के स्तर पर एक्य स्था स्थापित करना है जिसे जन्म जन्मातंर का साथ कहा जा सके।