आपने सुना होगा कि किसी जमाने में लोग सैकड़ों साल तक जीवित रहते थे। लोगों को बीमारियां भी कम हुआ करती थी। लेकिन अब मनुष्य की उम्र भी कम होती जा रही है।
अब बहुत ही कम लोग मिलते हैं जो शतक लगा पाते हैं। आपके मन में यह सवाल कभी उठा है कि ऐसा क्यों हुआ है।
वैज्ञानिकों और चिकित्सकों को भी इस बात की चिंता सताने लगी तो उन्होंने इसकी जांच शुरु कर दी और बताया कि अगर आप लंबे समय तक जीना चाहते हैं तो इन बातों का ध्यान रखना होगा।
जांच में मिला कम उम्र में मौत का कारण
शोध से पता चला है कि रोगों की जड़ें शरीर में नहीं मन में हैं, गिने चुने रोगों की हम बात नहीं कर रहे, करीब-करीब सभी रोगों की। इसलिए स्वस्थ रहना हो तो मन और मस्तिष्क को संतुलित में रखना चाहिए।
मन के किस भाव से किस रोग का खतरा रहता है, इस पर खोज करते हुए संयुक्त राज्य की नार्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी’ के चिकित्सा विज्ञानी डॉ. जॉन बेयाफुट ने हृदय रोग से पीड़ित बत्तीस व्यक्तियों की परीक्षण रिपोर्ट का विश्लषण किया और पाया कि उनमें धमनी अवरोध की स्थिति उनके स्वभाव में क्रोध की मात्रा के अनुरूप थी।
वे लोग जितने क्रुद्ध होते थे रोग का स्तर उतना ही बढ़ जाता और शांत रहते तो रोग तीन सप्ताह में ही नियंत्रित होने लगता। संयुक्त राज्य में ही इसी विश्वविद्यालय के करीब एक निजी विश्वविद्यालय ‘ड्यूक यूनिवर्सिटी’ के डॉ. रेडफोर्ड विलियम ने विभिन्न फैक्टरियों मे काम कर रहे दो हजार मजदूरों के बारे में पता लगाया और जांच की।
अकस्मात मृत्यु का सबसे बड़ा कारण
करीब पचीस साल पहले इन्ही लोगों को जांचा परखा गया था। गुस्से और मामूली कारणों से भी आक्रामक हो उठने वाले इन लोगों में पैंतालीस से पचपन साल की उम्र तक के लोग थे। जिनका क्रोधस्तर बहुत निम्न था, उनमें दस प्रतिशत लोग मर चुके थे। जिनका क्रोध उच्चतर था, उनमें से तीस प्रतिशत लोगों की मौत हृदय रोग, कैंसर व अन्य रोगों के कारण हुई थी।
डॉ. विलियम ने अपने एक अन्य अध्ययन में पुष्टि की है कि क्रोध अकस्मात मृत्यु का एक सशक्त कारण है, जबकि ध्यान और अच्छी पुस्तकों का अध्ययन मन के भावों को संयत संतुलित रखता है। विलियम ने नब्बे विद्यार्थियों के समूह का परीक्षण किया था कि कौन कितना क्रोध करता है। उन्हें ध्यान और आध्यात्मिक जीवन का पाठ सिखाया गया।
बीस वर्ष बाद फिर परीक्षण किया तो पता चला कि उनमें से साठ लोगों (पूर्व विद्यार्थियों ने) क्रोध पर एक हद तक नियंत्रण पा लिया था। नार्थ कैरोलिना स्टेट यूनिवर्सिटी के अध्ययन दल की रिपोर्ट के मुताबिक गंभीर हार्ट अटैक से तीन दिन पहले रोगी के मूड का ब्यौरा जुटाया गया तो सबसे प्रमुख मनोभाव क्रोध ही था।
तब हार्ट अटैक बार-बार होता है
एक बार हार्ट अटैक होने के बाद रोगी के लिए क्रोध घातक बन जाता है। जिन्हें एक बार हार्ट अटैक हो चुका है, क्रोध आने पर उनके हृदय की ‘पंपिंग क्षमता’ सात प्रतिशत से भी ज्यादा घट जाती है।
इस गिरावट को चिकित्सक हृदय में रक्तप्रवाह के लिए एक खतरनाक स्थिति मानते हैं। शोध के अनुसार, जिन्हें हृदयाघात का प्रथम दौरा पड़ चुका है और जो आसानी से क्रोधावेश में आ जाते हैं, उनकी मृत्यु की संभावना दो से तीन गुना तक बढ़ जाती है।
लिहाजा जरूरी है कि अपने मनोभावों को संतुलित संयमित रखा जाए।