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आप भी ऐसा करते हैं तो समझ लीजिए बुरे दिन आने वाले हैं

Tue, 17 Dec 2013 02:55 PM IST
ज्योतिर्मय
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अपनी पहचान और स्थिति को ऊर्जा से भरने के लिए अतीत पर गर्व करना जरूरी है। पर नई खोज साबित करती है कि अतीत पर गर्व ही करते रहने से व्यक्ति का विकास रुक जाता है।
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ईश्वर, आत्मा, लोक परलोक,अध्यात्म जगत में हासिल की गई उपलब्धियां और इतिहास तथा संस्कृति के क्षेत्र में भले ही हमारे पूर्वजों ने बड़ी कामयाबियां हासिल की हो, लेकिन उनकी उपलब्धियों को रटने से कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत रूप से दीन दरिद्र हो सकता है।

इसलिए अतीत की उपलब्धियों को रटने और उनमें खोए रहने की बजाए नई खोज की ओर बढ़ते रहने की चाहत होनी चाहिए। अतीत की उपलब्धियों को ढोते रहने से व्यक्ति की वर्तमान शक्तियां खोने लगती है।
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फुलर्टन में कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर जेराल्ड कोरी ने अतीत में ही जीने के आदी लोगो का अध्ययन करने के बाद कहा कि इस तरह कोई शक्ति या प्रेरणा मिलने की बजाय व्यक्ति भीतरी तौर पर कमजोर हो जाता है।

अपनी प्रगति पर असंतोष जताने और अतीत पर गर्व करने को नुकसानदेह बताते हुए प्रो. कोरी ने अपने निष्कर्ष बताते हुए कहा कि अतीत में रहने वाले लोग अपनी ऊर्जा का उपयोग अतीत की गलतियों पर दुखी होने में ज्यादा करते हैं। यह दुख या क्षोभ इस तरह बढ़ता जाता है कि अतीत के आधार पर वह भविष्य के लिए अंतहीन संकल्पों और योजनाओं में ही व्यस्त हो जाता है या कि उन्हीं में डूब जाता है।
 
जेराल्ड कोरी का कहना है कि दुनियादारी के मामलों में एकबारगी तो पिछले अनुभवों से सीखा भी जा सकता है। उदाहरण के लिए आपको किन्हीं स्थितियों या व्यक्तियों से धोखा मिला हो, या उनसे हानि हुई हो तो दोबारा उनसे बच सकते हैं।

लेकिन अध्यात्म या आत्मिक जगत में किसी प्रयोग या अभ्यास से गुजरते हैं, उनमे हर बार नई स्थितियों का सामना करना पड़ता है। क्योंकि आत्मा के जगत में कोई भी स्थिति दुहराई नहीं जा सकती।
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