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तब हर तरह का इलाज सस्ता और आसान हो जाएगा

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आहार को आसानी से पचने लायक बनाने में जीवकोष के जिस छोटे से भाग माइटोकाण्ड्रिया की अहम भूमिकी होती है, उसे समझने और व्याख्या विश्लेषण के लिए विज्ञान की अलग ही प्रशाखा बनाई गई ‘सेल-बायोलॉजी’ या ‘साइटोलाजी’।
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विज्ञान की इस शाखा पर काम कर रहे शिकागो यूनीवर्सिटी के डा. सिलविया, एच. बेन्स ली और नार्मण्ड एल. हॉर ने करीब तीन साल तक किए प्रयोग और अध्ययन के बाद कहा कि इस तत्व से पर्याप्त पर्याप्त ऊर्जा भी उत्पन्न होती है। संग्रहित ऊर्जा का रासायनिक स्वरूप है।

शरीर में जहां-जहां एटीपी (एडीनोसिन ट्राइफाँस्फेट) नामक इस शक्ति की आवश्यकता होती है, वहां अधिक मात्रा में माइटोकाण्ड्रिया पाये जाते हैं। आशय यह कि सूई की एक नोक के बराबर जगह में दस अरब ईकाइयों के रूप में छा जाने वाले ये घटक उस जगह का नियंत्रण भी करने लगते हैं। कि वह अपने अधिष्ठाता पर नियन्त्रण भी करता है।
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वण्डर बिल्ट यूनीवर्सिटी के रसायन शास्त्री अर्स जूथर को के मुताबिक रोगों के मूल कारण उतने उथले नहीं है जितने कि चिकित्सक समझते हैं। मौसम, आहार, चोट-फेट, एलर्जी जैसी दैनिक उथल-पुथल से तो शरीर संरचना स्वयं ही निपटती रहती है।
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वह दिन दूर नहीं जब मामूली उपचार से रोग होंगे दूर

उनका कुछ प्रभाव होती भी है तो उसे थोड़ी लड़-झगड़ के उपरान्त निपटाने या तालमेल बिठा लेने में सफल हो जाती है। इन्हीं उथले कारणों को दुर्बलता या रुग्णता का कारण मान बैठना भूल है।

जिस प्रकार परमाणु का मध्यवर्ती नाभिक उसकी सामर्थ्य का आधारभूत केन्द्र बिन्दु है उसी प्रकार जीव कोष के कलेवर में सन्निहित अनेकानेक रसायनों एवं हलचलों का सूत्र-संचालक उस भाग को कह सकते हैं जिसे ‘माइटोकाण्ड्रिया’ नाम दिया गया है। इसकी कार्य प्रणाली को केमिकल सिगनल कहते हैं।

चिकित्सा क्षेत्र क्या भविष्य में भी इसी तरह अनिश्चित और अटकलों के सहारे चलता रहेगा। डा. अर्स जूथर का कहना है कि कतई नहीं। जीवकोष के नाभिक में पाई जाने वाली माइटोकाण्ड्रिया नामक असीम क्षमता कायिक परिस्थितियों में आमूलचूल बदलावों की संभावना के प्रति आश्वस्त करती है। कठिन और जटिल रोगों का कारण जीवकोष के इसी अन्तराल में खोजा जा सकता है और वहां सुधार परिवर्तन करने के लिए हारमोन स्रावों का दरवाजा भी खटखटाया जा सकता है।

यानी वह दिन दूर नहीं जब कठिन और जटिल रोग भी मामूली उपचार से छूमंतर होते देखें जा सकते हैं। इलाज के लिए जो प्रक्रियाएं अपनाई जाती है, वे हर किसी के बस की बात होगी। कम खर्च वाली भी और समय, सामर्थ्य को भी कम से कम प्रभावित करने वाली।
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