शरीर और आत्मा के बीच मन सेतु का काम करता है। वह कर्मों के संस्कार रचता है। अगर वह बनाना छोड़ दे या पूर्व संस्कारों को मिटाने लगे तो अपना अस्तित्व ही खो देगा।
फिर मानवीय जीवन में भाव संवेदना की कोई भूमिका ही नहीं रह जाएगी क्योंकि भाव संवेदनाए भी मन में ही जन्म लेती है।
कर्मफल के इस नियम को पहले तो शास्त्रीय आधार तक ही सीमित रखा जाता था। अब वैज्ञानिक आधार पर भी इस नियम को परखा जाने लगा है।
अद्वैत आश्रम मुंबई के डा. नरोत्तम पुरी ने इस स्थापना की, शास्त्रीय आधार से हट कर परीक्षा की है। उनके अनुसार कर्मों की यह भूमिका इसी या अगले जन्म में काम करती है।
प्रारब्ध, संचित या क्रियमाण कर्मों के कारण ही कोई व्यक्ति कर्मठ या आलसी स्वभाव का होता है।