जिसकी इच्छा आज्ञा के बिना कोई काम न होता हो, वह मालिक ही तो हुआ। अपना मालिक तलाशें तो पाएंगे कि वह बाहर कहीं नहीं अपने ही भीतर है, अपना मन। शरीर स्वस्थ और निरोग रहता है तो मन ही कारण है और बीमार पड़ता है तो भी मन की ही वजह से।
अमेरिका के मन:शास्त्री और मनोरोग चिकित्सक डॉ. डैनियल कापोने ने एक अध्ययन के बाद कहा है दूसरे रोगों की तो बात तो छोड़े सर्दी जुकाम जैसी मामूली समस्याएं भी मन में पलने वाली चिंता, कुंठा, उलझनों और ग्रंथियों के कारण होती हैं। जटिल रोग भी वहीं उपजते हैं। और चिकित्सा भी वहीं अर्थात मनस्क्षेत्र में की जानी चाहिए।
उनके अनुसार जुकाम का निमित्त कारण विषाणु का आक्रमण होता है पर उनकी प्रकृति अन्य विषाणु सजातियों से सर्वथा भिन्न होती है। चेचक, खसरा आदि रोगों का आक्रमण एक बार होने पर शरीर में उनके रोगाणुओं से लड़ने की शक्ति आ जाती है। इसलिए इन रोगों के दोबारा होने का खतरा नहीं रहता।