अध्यात्म विद्या के अनुसार जीवन में तीन चीजों का संयोग होता है-आत्मा, मन, और शरीर। शरीर और आत्मा के बीच मन सेतु का काम करता है। वह कर्मों के संस्कार रचता है। अगर वह बनाना छोड़ दे या पूर्व संस्कारों को मिटाने लगे तो अपना अस्तित्व ही खो देगा।
फिर मानवीय जीवन में भाव संवेदना की कोई भूमिका ही नहीं रह जाएगी क्योंकि भाव संवेदनाए भी मन में ही जन्म लेती हैं। इसी जीवन में किए गए हों या पिछले किसी जन्म में कर्म अपने संस्कार ले कर ही मनुष्य का या जीव का पीछा करते रहते हैं।
कर्मफल के इस नियम को पहले तो शास्त्रीय आधार तक ही सीमित रखा जाता था। अब वैज्ञानिक आधार पर भी इस नियम को परखा जाने लगा है। अद्वैत आश्रम मुंबई के डा. नरोत्तम पुरी ने इस स्थापना की शास्त्रीय आधार से हट कर परीक्षा की है।
उनके अनुसार कर्मों की यह भूमिका इसी या अगले जन्म में काम करती है। प्रारब्ध, संचित या क्रियामाण कर्मों के कारण ही कोई व्यक्ति कर्मठ या आलसी स्वभाव का होता है। डा. पुरी इस विषय पर काम कर रहे हैं कि पिछले जन्म के कर्म इस जन्म को कैसे प्रभावित करते हैं।
उन्होंने त्वचा रोगों पर काम किया। उनका कहना है कि मां के गर्भ में भी त्वचा का निर्माण सबसे पहले होता है। मन भी उसके साथ साथ विकसित होता है। यही कारण है कि मन मे आने वाले विचार या भाव त्वचा को सबसे पहले प्रभावित करते हैं।
रोंगटे खड़े होना, मुरझाना, कम होने लगना या उड़ना जैसी स्थितियां मन में आने वाले विकारों के कारण ही आती हैं। उनका कहना है कि संस्कारों का केंद्र भी मन ही है। इसलिए मन में आने वाली संवेदनाएं पहले त्वचा पर और फिर शरीर के दूसरे अंगों पर और स्वास्थ्य के अलावा व्यावसायिक कामों के अलावा मानसिक स्थितियों पर भी अच्छा बुरा असर डालती है। उनका कहना है कि गंभीर रोगों के उपचार से पहले मन की पड़ताल भी करनी चाहिए।