जैसा देखा, सुना और महसूस किया हो वैसा ही व्यक्त करना सत्य की एक सीध है लेकिन, सीध पर ही रुक जाना काफी नहीं है। सत्य जीवन की एक ऐसी अवस्था है जिसमें रहते हुए अपने आस-पास के वातावरण का सम्यक और यथार्थ अध्ययन किया जा सकता है।
कीचड़ में फंसा हुआ बीज अपने आपको कीचड़ से अधिक नहीं सोच सकता, पर जब वही अंकुरित होकर अपने आपको चेतना के दायरे में समेट लेता है तो न केवल उस कीचड़ के प्रभाव से बच पाता है बल्कि उस कीचड़ से ही विभूतियां अर्जित करने लगता है।
सत्य के व्यापक रूप का विश्लेषण करते हुए अमेरिका के समाजशास्त्री सेली गेराल्ड ने एक व्यापक समाजशात्रीय अध्ययन के बाद कहा है। इस अध्ययन में समाज के विभिन्न वर्गों से बारह हजार लोगों को शामिल कर उनसे बीस सवालों के जवाब मांगे गए थे।
इन सवालों में उन व्यक्तियों के विश्वासों और मान्यताओ को परखा गया था। अध्ययन के मुताबिक लोग मानते है कितनी ही बेईमानी और आपाधापी फैल रही हो, लेकिन यह दुनिया ईमादारी और सच्चाई के बल पर ही चल रही है।
गेराल्ड ने अपने अध्ययन में महाभारत के आख़िरी श्लोक का उल्लेख किया है। इन श्लोक में वेदव्यास को कहते हुए दिखाया गया है कि, धर्म से ही अर्थ और काम की सिद्धि होती है पर इस बात को कोई नहीं मानता। पूरा महाभारत धर्म (सच्चाई) और अधर्म (अनीति) के टकराव की महागाथा कहती है फिर भी लोग क्यों नहीं सुनते।
ईमानदारी ही, सार्वभौम सत्य की अनुभूति करा सकती है। उन्होने कहा है कि भले ही लोग बेईमानी और फरेब का सहारा लेते हों पर यकीन तो सच्चाई में ही करते है। समाज में कुछ लोग अनैतिक तौर तरीके अपना लें तो ज्यादा कुछ नहीं बिगडेगा। किन्तु सभी अनैतिक तरीके अख्तियार कर लें तो समाज का सारा ताना-बना टूट जाएगा। इसलिए सच्चाई सार्वभौम धर्म है।
सच्चाई मन, बुद्धि और व्यवहार की एकरूपता का नाम है। उसकी शक्ति की थाह पाना किसी के लिए भी संभव नहीं जब तक इसका यानी व्यक्ति की समग्रता का एक भी कण जिंदा है, यह संसार कायम रहेगा। मनुष्य ने यदि सत्य का पल्ला छोड़ दिया तो वह अपने आप ही सत्यानाश की विभीषिका में जलकर अपना अंत कर लेगा।
कहावत है कि 'सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। यह गलत नहीं है क्योंकि सत्यनिष्ठ व्यक्ति अकेला हजार मिथ्याचारियों से भिड़ सकता है और अंततः वही विजय प्राप्त करता है।'