मानव शरीर में साठ अरब के लगभग कोशिकाएं है। प्रत्येक कोष हजारों पावर स्टेशन, परिवहन और संचार संस्थान की मिली-जुली व्यवस्था वाले एक शहर की तरह है।
कच्चे माल का आयात, नया माल होने और बचे हुए पदार्थों को निकाल फेंकने की गतिविधियां बराबर चलती रहती है। इन कोशाओं का व्यवहार और क्रिया प्रतिक्रिया देखें तो एक समर्थ प्रशासन की झांकी देखने को मिलती है।
जीवकोश कितने सूक्ष्म होते हैं, इसका यदि अनुमान लगाना चाहें तो इस आधार पर लगा सकते हैं कि एक करोड़ सेल्स आराम से एक पिन के सिरे पर बैठ सकते हैं। इनके थोड़े बहुत स्थूल घटकों की झलक ही माइक्रोस्कोपिक यंत्रों से हो सकती है।
विस्तार से देखना हो तो इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप की मदद लेना पड़ेगी। कोशिकाओं (सेल) के आधार पर देखने समझने की कोशिश करें तो पता चलेगा कि एक सौर-मण्डल या ब्रह्माण्ड अपने भीतर ही कायम है।
यह जिंदगी को आसान और व्यवस्थित करती है
शरीर के बारे में इन बारीक बातों का पता यों तो दसियों साल पहले चल गया था। नवीनतम जानकारी यह है कि बाहरी दुनिया या समाज में हम जिस व्यवस्था और सुशासन को लाना चाहते हैं, वह कहीं बाहर से नहीं अपने भीतर की अतल गहराइयों से ही आती है।
व्यक्ति के गुण कर्म विचार और भावों के लिए जिन गुणसूत्रों (जीन्स) को अक्सर जिम्मेवार ठहराया जाता है, जन्म से बहुत पहले मनुष्य की चेतना में आ विराजे थे। जर्मनी के पिट्सवेलि इंस्टीट्यूट के प्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो. एसटी कोवे का कहना है कि मनुष्य को अपनी किसी भी खोज के लिए इतराने की जरूरत नहीं है।
वह किसी खोज का दावा भी नहीं कर सकता क्योंकि हंम जो कुछ भी सोचते हैं वह कुदरत में पहले से मौजूद है। उसकी मौजूदगी ही वे तरंगे उत्पन्न करती हैं जो हमारी जिंदगी को आसान और व्यवस्थित करती है।
एक से एक हजार करने की क्षमता
इन और इस तरह के तमाम विवरण दिखाई देने और नहीं दीखने वाले संसार को वेदांत के एकोऽहम् बहुस्यामी की झाँकी प्रस्तुत करता है। एक कोष की बारीकियों की चर्चा करते हुए प्रो, कोवे का कहना है कि विराट् के इस लघु संस्करण की झलक एक कोष में मिलती है।
एक उदाहरण काफी है कि ओवम या डिम्ब कोष जिस तरह दो से चार, चार से सोलह और सोलह से दो सौ छप्पन, फिर 65 हजार 536 की गति से बढ़ते हुए कुछ ही पलों में दो अरब की संख्या पार कर जाते और एक मया जीव तैयार कर देते हैं, उसकी तुलना के लिए संसार में कोई गति नहीं मिलती।