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गंभीर रोगों का कारण पिछले जन्म के कर्म तो नहीं

Tue, 28 May 2013 02:40 PM IST
ज्योतिर्मय
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सत्तर प्रतिशत तक समस्याओं का हल आसानी से हो जाता है। इनमें रोग बीमारियां, तंग हाली और रिश्तों, कामकाजी तथा रोजमर्रा के जीवन में आने वाली सभी समस्याएं शामिल हैं। इन न हल होने वाली बहुतेरी समस्याओं को मनीषियों ने प्रारब्ध का नाम दिया है। प्रारब्ध यानी इस या पिछले जन्म के वे कर्म जिनका परिणाम भुगतना ही पड़ेगा।
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अभी तक तो कर्मफल का यह नियम धर्म अध्यात्म के जानकारों द्वारा ही बताया जाता है, पर अब जीवविज्ञान के जानकार भी दूसरे शब्दों में इस नियम को मानने लगे है। उनके अनुसार मनुष्य के स्वभाव, रहन-सहन और आदतों को नियंत्रित करने वाले गुणसूत्रों में कर्मफल का रहस्य भी छुपा हुआ है।

मियामी फ्लोरिडा में प्रैक्टिस कर रहे मनोचिकित्सक डा. ब्रायन वीज ने इलाज के लिए आए कुछ दुसाध्य रोगियों की जांच के दौरान पाया कि उनमे से कुछ दुसरे उपचारों के साथ गुणसूत्रों से छेड़छाड़ करने पर सहज ही ठीक हो गए।
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जटिल रोगों से ग्रस्त कई बीमारों की पिछली स्मृतियों में जाकर निदान करने के कई मामले आए हैं लेकिन डा. वीज ने कुछ प्रयोगों में पाया कि कुछ रोगियों के जींस विचित्र व्यवहार करते पाए गए। उस व्यवहार की कोई वजह नहीं थी। न माता पिता के गुणसूत्रों का कोई प्रभाव उन गुणसूत्रों में था और न ही जीवनशैली या खानपान की आदतों से रोग आया था।

फ्लोरिडा के सेंट्र्ल इंस्टीट्यूट आफ मेडिकल सांइसेज में चल रहे अनुसंधान प्रयोगों के सूत्रधार डा. ग्रीन्स का कहना है कि अभी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता लेकिन हमारी खोज इन नतीजों के करीब तक पहुंच गई है कि रोग का कारण मौजूदा शरीर से अलग है और वह गुणसूत्रो में ही है।

फिलहाल कोई प्रमाण नहीं है लेकिन आश्चर्य नहीं कि पिछले जन्म जैसी कोई स्थिति होती है तो रोगों की वजह वहीं मिले। यह निष्कर्ष सही साबित हुआ तो असाध्य रोगों और अविज्ञात कारणों के निष्कर्ष आधे अधूरे साबित होंगे। इस बारे में रोगों के कारण पिछले जन्म में मानने वाली प्रारब्ध की धारणा सही साबित होगी।
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