टेड सेरियोस जब अपने सामने कैमरा रखकर मन को जिस भी वस्तु पर केंद्रित करते थे, तो कैमरे के लैंस के सामने टेड की आकृति के स्थान पर उनका कल्पना चित्र उभर आता था। मिसाल के तौर पर, टेड ने यदि किसी घोड़े पर अपना ध्यान लगाया, तो कैमरे के लैंस में टेड की जगह घोड़े का चित्र उभरा आता था, जबकि कैमरे के सामने टेड सेरियोस बैठा था। भारतीय मनीषियों के मुताबिक, टेड के साथ हुई यह घटना न तो हिप्नोटिज्म है, न ही फोटोग्राफी की कोई ट्रिक है। वरन ऐसा होना साधक की ध्यान की गहन स्थिति में एकाग्र होने का फल है। इसी के बल पर मनीषी एक ही स्थान पर बैठे-बैठे न केवल मीलों दूर रहने वाले लोगों के मन की बात जान लेते थे, साथ ही दूर-दर्शन-श्रवण से उन्हें स्वास्थ्य लाभ भी देते थे।
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1963 में अनेक वैज्ञानिकों, फोटोग्राफरों, बुद्धिजीवियों तथा इलिनाइस सोसायटी फॉर साइकिक रिसर्च (यह संस्थान अमेरिका में मनोविज्ञान तथा अति मानवीय चेतना संबंधी शोध करती है) की उपाध्यक्ष पालिन ओहलर की उपस्थिति में टेड सेरियोस ने कई प्रतिबिंबों, फिल्मों पर नियंत्रण के कैमरों के प्रयोगों द्वारा भी कल्पना चित्र खींच दिखाए, तो तहलका मच गया। वैज्ञानिकों को भारी आश्चर्य हुआ कि इस तरह दूरवर्ती वस्तुओं के फोटो लेना केवल माइक्रो-फिल्म द्वारा ही संभव होता है।