कितना ही कुछ कहें सामान्य जीवन में शादी करने, परिवार बसाने और बच्चो का जन्म हुए बिना न परिपक्वता आती है और न ही व्यक्ति अपने आसपास के लोगों और समाज के प्रति निष्ठावान हो सकता है। संक्षेप मे वह जिम्मेदार जीवन नहीं जी सकता।
बंगलूरु की इंस्टीट्यूट आफ स्पिरिचुअल रिसर्च के डा. एसवी पारधी का कहना है कि विवाह का उद्देश्य परिवार को संयम. सेवा, सहिष्णुता और उदारता की प्रयोगशाला बनाना है।
इस बारे में हुए अध्ययनों का हवाला देते हुए डा. पारधी का कहना है कि असामान्य स्थितियो और अपवादों को छोड़ सकते हैं लेकिन समाज को अपनी योग्यता और प्रतिभा का लाभ देने वाले अस्सी प्रतिशत लोग घर गृहस्थी वाले ही हुए और होते हैं।
तब विवाह जन्म-जन्मांतर प्रेम बन जाता है
पारिवारिक जीवन शुरु करते समय होने वाले संस्कार और कर्मकांडों के विज्ञान पर सदगुरु जग्गी वासुदेव के विचारों के संदर्भ के साथ स्वामी चिन्मय भी अलग कोण से यही बात कहते हैं। उनके अनुसार विवाह संस्कार की भारतीय विधि में कुछ ऐसी प्रक्रियाओं को अपनाना गया है जिनका वैज्ञानिक और आधिदैविक महत्व है।
उनके अनुसार इस संस्कार के समय मंगलसूत्र बांधने या पहनाने की प्रक्रिया इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। मंगल सूत्र बांधने का उद्देश्य दो व्यक्तियों को शारीरिक और भावनाओं के स्तर पर ही नहीं, ऊर्जा के स्तर पर भी एक कर देना है। इस तरह विवाह एक जन्म का रिश्ता ना होकर जन्म-जन्मांतर का अमर प्रेम सूत्र बन जाता है।
एक ही जोड़ा कई जन्मों तक साथ रहा
पांरपरिक ढंग से जब दो लोगों को शादी के बंधन में बंधते हैं तो सिर्फ दो परिवारों या व्यक्तियों का आपसी मेल ही नहीं देखा जाता था, बल्कि उन दोनों की ऊर्जा के गहन मेल की संभावना को भी देखा जाता था।
मंगल सूत्र को तैयार करने का भी एक विस्तृत विज्ञान है। उस आशय का विज्ञान यह है कि दंपत्ति को एक नहीं, बल्कि कई जन्मों के बंधन में बांध देता है। कई बार देखने में आया है कि एक ही जोड़ा कई जन्मों तक साथ रहा है।