बेशक सभी तरह के रोगियों की तकलीफें आध्यात्मिक उपचारों से ठीक नहीं होती। इसका मतलब यह नहीं है कि वह उपाय असमर्थ हैं। वजह यह है कि उनके उपचार की सही विधि और प्रक्रिया नहीं अपनाई जाती।
जापान की तोकोहू यूनिवर्सिटी के शोध अनुसंधान विभाग के विद्यार्थी के शोध प्रबंध पर टिप्पणी करते हुए उसके गाइड प्रो.मसाहिरो यामागुची ने यह बात उन्होंने यज्ञों से अस्थमा, हृदय रोग, कैंसर और मस्तिष्क के कुछ रोगों के उपचार की विधियों पर किए गए शोध के प्रकाशन अवसर पर कही।
शोध प्रबंध के एक अंश का जिक्र करते हुए यामागुची ने अपनी ओर से एक संदर्भ का जिक्र किया कि हाइपॉक्सिया (कॉमा) के रोगी को एक स्थिति के बाद वेण्टीलेशन पर रखा जाता है।
उस स्थिति में जब कभी सांस लेने में दिक्कत होती है और कृत्रिम सांस दी जाती है तो उसमें आक्सीजन के अलावा पांच प्रतिशत इसमें कार्बन डायऑक्साइड भी होती है। इतना अंश इसलिए कि मस्तिष्क के केन्द्रों को उत्तेजित कर श्वसन प्रक्रिया नियमित बनायी जा सके।