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विज्ञान ने भी माना, गुरू पूर्णिमा का दिन है कुछ खास

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हर साल आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता है। इसका कारण यह है कि इसी दिन महाभारत महाकाव्य और पुराणों के रचयिता महर्षि व्यास का जन्म हुआ था।
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इन्हें आदिगुरू माना जाता है। प्राचीन काल से ही इस दिन गुरू की पूजा का नियम चला आ रहा है। छात्र इस दिन गुरू की पूजा करते हैं और उन्हें भेंट अर्पित करते हैं।

अब विज्ञान भी मान रहा है कि आषाढ़ पूर्णिमा के दिन गुरू की पूजा और गुरू पू्र्णिमा का उत्सव मनाया जाना फायदेमंद है।

विजडम आफ ईस्ट के लेखक कहते है

गुरु को परमात्मा से भी ज्यादा महत्व देने की मान्यता भारत में ही प्रचलित है। और इस चलन की वजह कोई सामंती संस्कार नहीं हैं, जैसा कि पश्चिम का आधुनिक समाज सोचता है। सतही तौर पर गुरु चुनने का काम अपने लिए एक आदर्श या रोल मॉडल चुनने की तरह है।

लेकिन विजडम आफ ईस्ट के लेखक आर्थर चार्ल्स स्टोक का कहना है कि गुरु की मान्यता भारत में खोजी गई शून्य, छंद और व्याकरण की खोज जैसे ही महत्वपूर्ण है। इस विषय में अपने अध्ययन और निष्कर्षों का हवाला देते हुए स्टोक ने कुछ रोचक बातें कही हैं।

आषाढ़ की पूर्णिमा के दिन गुरु की भक्ति

शिष्य के लिए गुरु की आराधना या सेवा श्रेयस्कर है, क्योंकि वह करीब है। परमात्मा सूरज की भांति है, जिसकी रोशनी जीवनदायी होते हुए भी उसकी ओर सीधे देखा नहीं जा सकता।

जापान में बौद्ध साधकों की एक पंरपरा जेन संप्रदाय के अठाइस साधकों का अध्ययन करने के बाद उन्होंने कहा कि भारत में आषाढ़ की पूर्णिमा के दिन गुरु के प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा व्यक्त करने के लिए उत्सव मनाने की मान्यता अर्थपूर्ण है।

आषाढ़ पूर्णिमा के दिन आकाश में बदलाव

आषाढ़ पूर्णिमा के दिन हो सकता है, चांद नहीं भी दिखाई दे। वर्ष में और भी पूर्णिमाएं हैं, जो आषाढ़ पूर्णिमा से ज्यादा महत्वपूर्ण है जैसे आश्विन मास में शरद पूर्णिमा फिर उसके बाद कार्तिक और वैशाख पूर्णिमा। लेकिन आषाढ़ पूर्णिमा के दिन व्यक्ति की भूख, नींद और चित्त का विचलन कम हो जाता है।

इस कारण शरीर और चित्त में आई रिक्तता उसे आंतरिक दृष्टि से समृद्ध बनाती है। बदलाव का कारण बताते हुए स्टोक कहते हैं कि कि इस दिन अल्ट्रावॉयलट किस्म के विकिरण आकाश में व्याप्त हो जाते हैं। इन विकिरणों के कारण व्यक्ति का शरीर और मन विशेष स्थितियों में आ जाता है।
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शिष्य के सामर्थ्य के बाहर

स्टोक के बताए तथ्य से अलग गुरु पूर्णिमा की एक अलग व्याख्या स्वामी निरंजन तीर्थ ने की है। उनके अनुसार शिष्य जनम जनम के अंधेरे को लेकर आए हैं। गुरु चांद की तरह है, आषाढ़ की पूर्णिमा! की तरह जो शिष्यों के अंधेरे बादलों से घिरा है। इस पूर्णिमा में संकेत गुरु की तरफ भी है और शिष्य की तरफ भी।

वैसे गुरु को सूरज ही कहा होता, तो बात ज्यादा तथ्यपूर्ण होती। और सूरज के पास प्रकाश भी महान है, विराट है। लेकिन परमात्मा की तरफ सीधा नहीं देख पाते, सूरज की तरफ सीधा देखना बहुत मुश्किल है। लेकिन सूरज की ओर देखना शिष्य के सामर्थ्य के बाहर है।

गुरु एक दर्पण की तरह है जो सूरज की रोशनी पकड़ता है और शिष्य को दे देता है। यह रोशनी मधुर हो जाती है। उसका गुण धर्म बदल जाता है। लेकिन यह काव्यात्मक संदर्भ है। इसे स्टोक का अध्ययन और अर्थपूर्ण बना देता है।

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