दो ढाई साल पहले स्विटजरलैड की सर्न प्रयोगशाला में एक कण का पता लगा था तो वैज्ञानिक और विज्ञान की तुलना में रहस्यवाद को तरजीह देने वाले ईश्वरवादियों दोनों की बांछे खिल गई थी। विज्ञानवादियों को इसलिए कि दुनिया में होती रहने वाली उलटफेर के लिए एक सुनिश्चित कारण मिल गया है।
आस्थावादियों का कहना था कि अब विज्ञान भी इस नतीचे पर पहुंच रहा है कि दुनिया में होते रहने वाले बदलाव की व्याख्या करने में फिलहाल विज्ञान असमर्थ है और कहीं न कहीं वह भी सर्वशक्तिमान कण में आस्था रखने के पक्ष में मौन है या कोई प्रश्नचिह्न नहीं लगा रहा।
हिग्स कण के सिध्दांत से परिचित कराने वाले ब्रिटिश भौतिक वैज्ञानिक प्रो.पीटर हिग्स दुखी हुए कि लोग इस कण को ईश्वर कह रहे हैं। अज्ञानतावश धार्मिक लोग इसे ईश्वरीय कण कहकर प्रचारित कर रहे हैं।
प्रयोगशाला में जब इस सिद्धांत को प्रयोग परीक्षण के तौर पर सही पाया गया तो उस कण का नाम रखा गया हिग्स बोसान। हिग्स खुद प्रोफेसर पीटर हिग्स के नाम पर था और बोसान भारतीय वैज्ञानिक सत्येन्द्र नाथ बोस और अलर्बट आईस्टीन के नाम (बोस+आन) पर।