सभी जानते हैं कि कल के बारे में छोड़िये, आने
वाले पल के बारे में किसी को पता नहीं पर हर कोई भविष्य के बारे में जानने के लिए
उतावले, आतुर और व्यग्र रहते हैं। इस उत्सुकता और ललक को भुनाने के लिए ज्योतिषियों
और भाग्य बांचने वालों की अच्छी खासी संख्या समाज में मौजूद है।
पर ऐसे लोग
अंगुलियों पर गिने जाने लायक हैं जो कह सकें कि उनकी पचीस तीस प्रतिशत
भविष्यवाणियां भी सही निकली हों। वजह बताते हुए शरीर शास्त्री एल. सोफी कहते हैं कि
जिंदगी की रफ्तार तय है। उस रफ्तार और उसके मिजाज को भुनाने चलेंगे तो गड़बड़ी होगी
ही।
एल. सोफी ने अपनी पुस्तक 'द रिद्म ऑफ लाइफ' में लिखा है कि उतार-चढ़ाव
एक निश्चित क्रम से आते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि विज्ञान इन्हे ग्रह नक्षत्रों
के बजाय बायोरिद्म का नाम दे रहा है यानी जिंदगी की लय-ताल। इन नतीजों के अनुसार
शरीर की सामान्य गतिविधियां भी लयताल के अनुसार एक निश्चित अन्तराल के बाद अपने
आपको दोहराती हैं।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक एफ.ए ब्राउन के अनुसार तो कोशिका
विभाजन की प्रक्रिया लयबद्ध तरीके से चलती हैं। उनके अनुसार ग्रह-नक्षत्रों के
वार्षिक चक्र से मनुष्य स्वाभाविक ही संचालित होता है। इस प्रक्रिया के अनुसार 21
दिन अथवा 25 दिन के एक चक्र में मनुष्य शरीर में एक पूर्ण परिवर्तन होता रहता है
जिसमें जीवन-शक्ति का नवीनीकरण होता और नई चेतना, नई स्फूर्ति का उदय होता
है।
इसे अधिक स्पष्ट करते हुए ब्रिटिश वैज्ञानिक गेगिर ल्यूस अपनी पुस्तक
'बाडी टाइम' में बताया है कि वस्तुत: यह हारमोन परिवर्तन के कारण होता है जिसका
परिवर्तन चक्र लयबद्ध तरीके से चलता रहता है। बत्तीस दिन के हिसाब से यह क्रम आता
जाता रहता है।