अगर आप भी किसी बात को लेकर चिंतित और तनाव में रहते हैं और इससे मुक्ति के लिए उपाय ढूंढ रहे हैं तो आपको एक ऐसा उपाय बता रहे हैं जिसमें न किसी तेल की जरुरत है और न बाम लगाने की।
यह एक जापानी तरीका है जो इन दिनों काफी लोकप्रिय होता जा रहा है।
सांसों से जानें मन का हाल
तनाव से मुक्ति के इस जापानी विधि में नाभिकेंद्र से सांस लेने का अभ्यास किया जाता है। जापान के बौद्ध मठों में लोकप्रिय यह उपाय जिसे साधकों की भाषा में तांदेन कहते हैं तनाव से बचने के एक अनूठा उपाय साबित हुई है। चिकित्साविदों की राय में कोई व्यक्ति कितना तनाव में है, इसका एक मापदंड़ है। यह मापदंड मशीनी नहीं बल्कि शारीरिक है।
आल इंडिया मेडिकल इंस्टीट्यूट में मनोचिकित्सक रहे डा. जीएन महंतों के अनुसार वह मापदंड श्वास है। श्वास लयबद्ध है तो व्यक्ति तनाव से पीड़ित नहीं है और अराजक चल रही है, तेज गति से, अनियमित और उथली है तो तनावग्रस्त है। कोई व्यक्ति अपने वक्ष (सीने) से जितना नीचे से श्वास लेता और छोड़ता है, वह व्यक्ति उतने ही विश्राम अथवा तनावमुक्त स्थिति में होता है।
इसलिए बच्चे हमेशा खुश रहते हैं
चिकित्साविदों के अनुसार बच्चों का जीवन सहज, सरल और तनावमुक्त होता है, क्योंकि उनकी सांस नाभिकेंद्र से चलती है। बड़ा होने पर जिंदगी की भागमभाग बढ़ने से उनके सांस का तरीका बदल जाता। वे सांस को नाभिकेंद्र तक नीचे नहीं ले जाते। और तनावग्रस्त होने लगते हैं। जाहिर है यह तनाव कार्यक्षमता को प्रभावित करता है। सांस को नाभिकेंद्र तक वापस ले जाने के लिए बौद्ध विद्वान अमित तिकोशो ने इस विद्या के कुछ प्राथमिक सूत्र बताए हैं।
उऩके अनुसार शुरुआती तौर पर लगातार चालीस दिन तक आधा घंटा सुबह और आधा घंटा शाम को शांत हो कर से लेटें। इस दौरान ध्यान रखें कि सांस भीतर जाए, तो पेट ऊपर उठे और बाहर जाए तो पेट नीचे की ओर पिचके। इस दौरान वक्ष (सीना) शिथिल रहना जरूरी है। चालीस दिन निरंतर यह साधना करने से व्यक्ति की दिनचर्या में सकारात्मक तब्दीलियां होती हैं।
गुस्से पर काबू होने लगता है। ईर्ष्या, द्वेष और अनिद्रा पर भी नियंत्रण आ जाता है। मूचा से व्यक्तित्व संतुलित होता और मन तनाव से मुक्त रहने लगता है। तांदेन साधना का यह प्रारंभिक चरण सध जाए तो आगे का मार्ग साधक खुद ही तलाशता है या अपनी बढ़ी हुई कार्यक्षमता और ऊर्जा के जरिए तरक्की की नई गति पकड़ लेता है।