सांस लिए बिना हम जीवित नहीं रह सकते इसलिए हम सभी सांस लेते हैं। लेकिन सिर्फ जीने के लिए ही सांस लेना ठीक नहीं है।
आपको इस तरह से सांस लेना चाहिए कि आप रोग मुक्त जीवन जी सकें। इसके लिए जरूरी है कि आप सांस लेते समय कुछ खास बातों का ध्यान रखें।
गंभीर रोगों से बचा सकता है सांस लेने का तरीका
फेयरफिल्ड आयोवा (संयुक्त राज्य) स्थित अंतर्रराष्ट्रीय महर्षि वैतिक विश्वविद्यालय के प्रो. बी पियर्सन ने एक अध्ययन के आधार पर कहा है कि, सांस लेने के तौर तरीके में थोड़ा सा बदलाव शरीर को चालीस प्रतिशत तक गंभीर रोगों से बचा सकता है।
इन रोगों में रक्तचाप, अनिद्रा, हृदयरोग और मधुमेह जैसे रोग शामिल हैं।
सांस लेते समय करते हैं गलतियां
2005 से शुरु किए गए इस अध्ययन में तीन वर्ष तक लोगों के रहन सहन, जीवनचर्या और योग ध्यान के अनुभवों को शामिल किया गया।
इसमें योग ध्यान कर रहे साधक भी शामिल थे और सामान्य तथा विलासी जीवन जी रहे सभी तरह के लोग थे। तीन साल के अध्ययन आधार पर पाया गया कि सांस लेने का सही तौर तरीका अपनाया जाए तो राजरोगों - बड़ी बीमारियों से बचाव हो सकता है।
प्रो. पियर्सन ने इस निष्कर्ष को योगशास्त्रों के करीब पाया कि मणिपुर चक्र (नाभिकेंद्र) तक सांस जानी चाहिए। आमतौर पर लोग फेफड़े या कई बार तो गले तक ही हवा जाने देते हैं और उसे बाहर फेंक देते है।
बच्चे लेते हैं सही तरीके से सांस
जबकि श्वास प्रश्वास की प्रकिया नाभि तक जाने से ही पूरी होती है। जन्म लेने से पांच छह साल का होने तक बच्चे सांस लेते समय नाभि तक हवा ले जाते हैं।
साफ दिखाई देता है कि आती जाती सांस के समय उनका नाभि केंद्र उठता और उतरता है। पांच छह साल की उम्र तक सांस की यह गति साफ दिखाई देती है। जिंदगी में थोड़ी जटिलता आने के बाद यह सिलसिला टूटना शुरु होता है।
मन को शांत, स्थिर और एकाग्र रखना है तो हर सांस के साथ मणिपुर चक्र तक जाना जरूरी है। इसका कारण तनाव और चिंता है।
कम से कम चौबीस मिनट सांस के लिए
एमवीयू के योग विभाग ने इस अध्ययन के बाद ध्यान में गहरी सांस लेने और छोड़ने का क्रम जोड़ा है। नाभिकेंद्र तक सांस लेने और छोड़ने का अभ्यास जितना किया जा सके, उतना ठीक है। पर कम से कम सुबह और शाम मिला कर कम से कम चौबीस मिनट जरूर होना चाहिए।
योगशास्त्रों में इस अवधि को एक घड़ी कहा है, जो चौबीस मिनट के बराबर है। इस अवधि में सांस को नाभि तक ले जाने और वहीं से सांस छोड़ने का भी अभ्यास किया जाता है। चुने हुए मंत्र का जप भी साथ साथ चलना चाहिए। जापान की खास बौद्धशैली में एक ध्यान भी इसके लिए सदियों से प्रचलित है।
तांदेन नामक इस पद्धति में भी सांस को नाभिकेंद्र तक ले जाने का अभ्यास किया जाता है। वहां यह ध्यान मुख्यरूप से एकाग्रता और चित्त के लय के लिए किया जाता है। तांदेन का अर्थ ही है श्वास का प्राथमिक स्त्रोत- नाभिकेंद्र। एमवीयू की इजात की गई पद्धति में शरीर, मन और मन:स्थिति के समग्र स्वास्थ्य संतुलन पर भी जोर है।