कहते हैं कि यदि आपने मन को जीत लिया तो आपके सामने दुनिया-जहान है और अगर मन मारकर बैठ गए तो मोक्ष। यानी जो उपाय अंतर्जगत में लाभदायक होते हैं वह संसार में अक्सर बेकार साबित होते हैं। कभी-कभी तो हानिकारक भी। लेकिन मौन ऐसा उपाय है जिससे आंतरिक जगत के साथ बाहरी दुनिया में भी मदद मिलती है। जापान के बौद्धमठ के लामा चिन्ह यान ने अपने साथी भिक्षुओं के जरिए कराए एक अध्ययन के बाद कहा है कि ये नतीजे 85 प्रतिशत तक सही हैं।
नतीजों का निचोड़ बताते हुए उन्होंने स्पिरिचुअल मानीटर में लिखा है कि मौन से मन की मृत्यु भी हो जाती है और वह शक्तिशाली भी बनता है। जिन्हें मोक्ष के मार्ग पर जाना है वह इस उपाय से मन को नष्ट कर सकते हैं और जो भरपूर जिंदगी जीना चाहते हैं वह मौन से मन की शक्ति बढ़ा सकते हैं।
मठ में किए प्रयोगों के दौरान करीब दो सौ लोगों को चुना गया। इनमें विद्यार्थी, साधक, कामकाजी, व्यवसायी और नौकरीपेशा सभी तरह के लोग थे। सभी लोगों से कहा गया कि अपने काम करते समय चुप रहना है। चुने गए लोगों में मठ से बाहर रहने वाले लोग भी थे। सभी भाग लेने वालों को एक नोटबुक दी गई जिसमें दिए गए प्रश्नों का क्रम से उत्तर देना था।
इक्कीस दिन के अभ्यास के बाद नोटबुक में भागीदारों के लिखे जवाब और निरीक्षक साधकों की टिप्पणियों को मिला कर देखा गया। निष्कर्ष निकला कि ध्यान दोनों तरह के काम में लगे लोगों के लिए लाभदायक हैं। योगसाधना में तो मौन का वैसे ही बहुत महत्व है। कामकाजी या लौकिक जीवन में मौन से सकारात्मक सोच का विकास होता है।
इस तरह की सोच आंतरिक या मानसिक शक्ति को और मजबूत करती है। ध्यान योग और मौन का निरंतर अभ्यास करने से शरीर की बीमारियों से लड़ने की क्षमता बढ़ती है। लामा ने काम करते करते मौन रहने की विधि के बारे में भी लिखा है। यह विधि अनापानसति नामक बौद्ध साधना का ही एक संस्करण है।
उसके अनुसार काम करते समय ज्यादा से ज्यादा चुप रहने का अभ्यास करना चाहिए। काम करते हुए बीच-बीच में सांसो के आने जाने पर ही ध्यान केंद्रित करना और जो भी दिखाई या सुनाई दे रहा है उसे बिना किसी प्रतिक्रिया के देखते रहने के लिए कहा गया है। इस तरह काम के दौरान मौन के अभ्यास से मन को शांति और शक्ति मिलती है।