प्राणायाम से व्यक्ति अपने फेफड़ों के आयतन का अधिकतम भाग उपयोग में लाता है, जिसे ‘वायटल केपेसिटी’ कहते हैं। नियमित अभ्यास से फेफड़ों का रिजिड्यूअल वॉल्यूम घटता जाता है और वायटल केपेसिटी बढ़ती जाती है। इस तरह लगभग 25 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक फेफड़ों के आयतन का अधिकतम उपयोग होता है, जिससे अधिक ऑक्सीजन एवं प्राण वायु मिलने से अधिक जीवनी-शक्ति प्राप्त होती है।
शारीरिक कार्यक्षमता में वृद्धि होती है। चिकित्सा विज्ञानी रोपार्ड ने अपने शोध निष्कर्ष में बताया है कि लयबद्ध सांस लेने से फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, साथ ही शरीर और मन भी बढ़ी हुई प्राण वायु से अधिकाधिक सक्रिय सबल और परिष्कृत बनते हैं। उपासना करते हुए प्राणायाम के चमत्कारी लाभ होते हैं।
चिकित्सा विज्ञानी जे.एफ. नन ने अपनी कृति ‘एप्लाइड रेस्पिरेटरी फिजियोलॉजी’ में कहा है कि प्राणायाम से फेफड़ों की क्षमता में असाधारण वृद्धि होती है। प्राणायाम से ऑक्सीजन उपयोग की मात्रा एवं अवशोषण प्रतिशत बहुत अधिक बढ़ाया जा सकता है, बल्कि प्राण वायु की अभिवृद्धि करके शारीरिक मानसिक क्षमता में कई गुनी अभिवृद्धि की जा सकती है।