कोई कितना ही परेशान हो, खुद या कोई साथी, जो भी गले लगाता है, परेशानियों से निजात पाने लगता है। इस तरह एक व्यक्ति की आत्मिक ऊर्जा दूसरे के चित्त और चेतन में प्रवेश करने लगती है। फिर परेशान व्यक्ति को तो राहत मिलती ही है, जो दूसरे को गले लगा रहा है वह खुद भी ऊर्जा से भर उठता है।
आत्मविकास के गुर सिखाने वाले तो यह बात कहते ही हैं, चिकित्सा विज्ञानी भी इसकी पुष्टि करने लगे हैं। उनके अनुसार दिन में चार बार कोई व्यक्ति किसी को गले लगाता है तो उसमें रोगों से लड़ने की शक्ति आती है, आठ बार किसी से प्रेमपूर्वक मिलने पर रोगों का उपचार करने की शक्ति विकसित होती है।
अध्यात्म गुरु मां अमृतानंदमयी की तरह कोई निश्छल और आत्मीयता से बिना गले लगाने लगे तो उसमें बिना कुछ किए दूसरों का दुख दूर करने की शक्ति आने लगती है। तिरुअनंतपुरम में परामनोविज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधान कर रही संस्था रिसर्च फार स्पिरुचअल न्यूरेशन एंड डेवलपंमेंट के निदेशक प्रो. अनंतमूर्ति का कहना है कि इस शोध का विचार गुरुओं और साधुओं के अलावा प्रियजनों द्वारा अपने लोगों को गले लगाने का चलन देख कर आया।
मेलजोल का यह तरीका दुनिया के तमाम देशों और धर्मों में हैं। अध्ययन में यह भी निकल कर आया कि रीति रिवाजो और स्नेह जताने के तौर तरीके कितने ही अलग हों पर गले मिलना, बाहों में भरना और छाती या हृदय से लगाने का रिवाज सभी जगह, समय और सभ्यताओं में समान रूप से मौजूद है।
अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान के तंत्रिका शास्त्री डा. नरीमन के अनुसार दो व्यक्ति गले मिलते हैं तो वे एक दूसरे में ऊर्जा का आदान प्रदान करते हैं। यह आदान प्रदान बहुत कुछ पूंजी निवेश की तरह होता है। इस निवेश के बाद दोनों पक्षों का आदान प्रदान बढ़ता है।