वक्त अच्छा या बुरा नहीं
होता, आदमी की अपनी कोशिशें और मनस्थिति अच्छी या बुरी होती है। लेकिन कभी-कभार
आसमान में स्थित सितारे और उनकी स्थितियां भी आदमी की कोशिशों और उनके नतीजों को
प्रभावित करती हैं।
जैसे पंचांग में अक्सर लिखा होता है कि कभी रात में तो
कभी दिन में भद्रा रहेगी। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भद्रा सबके लिए खराब है या
सबके लिए अच्छी। भारतीय ज्योतिष संस्थान के पंडित देवीदत्त शर्मा ने 1400 तिथियों
और ढाई हजार लोगों के कामकाज का विश्लेषण किया है।
इस विश्लेषण के बाद वे
इस नतीजें पर पहुंचे कि भद्रा किसी के लिए अच्छी होती है, तो किसी के लिए बुरी।
पौराणिक दृष्टि से भद्रा सूर्य की पत्नी छाया से जन्मी है। और शनि की बहन है। ये
पुण्य कार्य में विघ्न बाधा और दुष्कर्मों में धकेलने की खासी रुचि रही है। जन्म के
बाद, विवाह के समय भद्रा के उपद्रवों को देखकर ब्रह्मा ने कुछ खास मुहूर्त तय किए
और छूट दी कि इन मौकों पर तुम विघ्न बाधा पैदा करो, जो तुम्हारी सेवा और आदर करे।
उन्हें बख्श दो।
इस खास स्थिति को विष्टी भी कहते हैं। शास्त्रीय मर्यादा है
कि जो लोग पुण्य कर्म करते हैं, अच्छे स्वभाव के हैं और दूसरों की भलाई में रत रहते
हैं, उन्हें यह पीड़ित नहीं करती। पंडित देवीदत्त का कहना है कि हमारे ऋषि मुनियों
ने अपने स्वभाव में बदलाव लाकर बुरे वक्त को अच्छे में बदलने का उपाय निकाला है।
भद्रा में कोई भी शुरुआत करने की मनाही है पर जातक भास्कर के अनुसार जरूरतमंद लोगों
को दान दे कर उनकी सेवा कर मुहूर्त को उलटा जा सकता है यानी बुरे मुहूर्त को सही
किया जा सकता है।
विधान तो यहां तक है कि सतकर्मों में लगे रहने वालों का
बुरा हो ही नहीं सकता। आकाश में गरजने, बरसने वाले बादल खेत में उग रही फसलों को
निहाल कर देते हैं। जबकि टूटे फूटे झोपड़ों और सड़क किनारे लगे आवारा पेड़ों को
नेस्तनाबूत कर देते हैं।