ईश्वर के प्रति लगाव और उसका डर नहीं होता तो यकीन मानिए दुनिया आज जैसी भी है, उससे कम से कम दस गुना ज्यादा खराब होती। महात्मा गांधी का वह प्रसंग प्रसिद्ध है जिसमें एक अनीश्वरवादी उनसे दलील करता है कि आप कहते हैं कि अगर भगवान है तो दुनिया में इतनी अनीति और अन्याय क्यों है? गांधी जी का उत्तर था कि ईश्वर के होने के वावजूद दुनिया की यह हालत है। सोचो अगर वह नहीं होता तो दुनिया की क्या हालत होती।
गांधीजी की इस दलील को टैक्सास की बेयलर यूनिविर्सिटी में पिछले दो साल से चल रहे एक विचित्र और व्यापक अध्ययन में तार्किक परिणति मिली है। अध्ययनों का सारतत्व बताते हुए विश्वविद्यालय के प्रोफेसर बायरन जानसन ने कहा है कि अध्ययन में 1944 से 2010 तक हुए 273 शोध सर्वे शामिल किए गए हैं। नतीजों के अनुसार 90 प्रतिशत लोगों का मानना है कि ईश्वर को जवाब देना पड़ेगा, इसलिए वे गलत काम नहीं करते।
बायरन के निष्कर्ष ‘मोर गॉड लेस क्राइम’ नाम से प्रकाशित रिपोर्ट में अब तक हुए सर्वे को परखने के लिए अलग अलग पैमाने अपनाए गए ताकि नतीजे ज्यादा प्रामाणिक हों। इन अध्ययनों में दूसरे विश्व युद्ध और उसके बाद की स्थितियों से लेकर छोटे मोटे 150 युद्धों और दंगों के समय मनुष्य के व्यवहार में आए अचानक बदलावों को भी रेखांकित किया गया।
अध्ययन में बोस्टन, शिकागो और फिलाडेल्फिया के 2358 युवकों को शामिल किया गया। वे सभी प्रायः एक जैसी सामाजिक स्थिति और समान शैक्षणिक पारिवारिक पृष्ठभूमि से आए थे। देखा गया है कि उनमें जो युवक चर्च या किसी और आराधना स्थल पर जाते थे उनका रुझान अपेक्षाकृत ज्यादा सामाजिक था। रिचार्ड फ्रीमेन ने तो सुझाव दिया है कि लोगों को नैतिक बनाने के लिए धर्मसभाओं के जरिए या और तरीकों से भी ईश्वर पर विश्वास को बढ़ावा देना चाहिए।