मनुष्य का मन या तो अतीत में भटकता है या भविष्य में। जबकि जीवन है अभी और यहीं। जीवन है सदा वर्तमान। जीवन को हम चूकते हैं इसी कारण कि मन वहां होता है जहां जीवन नहीं। और जहां जीवन है वहां मन कभी होता नहीं। तुम या तो सोचते हो वह जो घट चुका, या साचेते हो वह जो घटेगा।
जो घट चुका है वह अब कहीं भी नहीं, और जो घटेगा, वह भी अभी कहीं नहीं। है तो केवल वही, जो अभी है, यहीं है, इस क्षण है। जो न तो घट चुका है और न घटेगा, बल्कि जो घट रहा है। जरा तुम चूके कि उससे तुम भटक जाओगे। क्योंकि वर्तमान का क्षण बड़ा संकरा है। अनंत का वह द्वार है, लेकिन द्वार बड़ा संकरा है।
जीसस ने कहा है, ‘नैरो इज दि गेट’-द्वार बहुत संकरा है। यद्यपि अनंत का है। अगर तुम उसमें कूद गये, तो तो शाश्वत जीवन तुम्हारा होगा। अगर तुम उससे डांवाडोल रहे, इस तरफ उसमें भटकते रहे, तो क्षणभंगुर जीवन तुम्हारा होगा; यह बड़ा विरोधाभास है। अगर वर्तमान क्षण में कोई उतर जाए, तो शाश्वत से मिलन होना है। और अगर वर्तमान क्षण से कोई चूक जाए, तो क्षणभंगुर से मिलन होता है।
और वर्तमान का क्षण इतना छोटा मालूम पड़ता है, शायद इसीलिए तुम उसे छोड देते हो। अतीत बहुत लंबा है। भविष्य भी बहुत लंबा है। भ्रांति होती है कि अतीत और भविष्य दोनों को मिला दें, तो शाश्वत बन जाता है। इसलिए मन सोचता है अतीत में जाओ, भविष्य में जाओ, वर्तमान में क्या रखा है? वहां जगह कहां? वहां जरा सा भी तो स्थान नहीं है।
वहां तुम जैसे ही सजग होते हो, वैसे ही वर्तमान जा चुका होता है। द्वार का पता चलते ही द्वार पीछे हट जाता है। वहां तो केवल वे ही प्रवेश कर सकते हैं, जिनके मन में एक भी विचार न हो। जो इतने शून्य हों कि चूकने का कोई कारण ही न बचे; एक विचार भी चुका देगा है।
विचार से भी ज्यादा संकरा है वर्तमान का द्वार। और समस्त ध्यान, बस एक ही बात की कोशिश है कि कैसे तुम्हें पीछे से यहां ले आए। कैसे तुम्हें आगे न जाने दें, कैसे तुम यहीं ठहर जाओ, कैसे तुम स्थिर हो जाओ, कैसे निर्विचार हो जाओ कि द्वार तुम्हें दिखाई पड़ जाए। और द्वार सदा खुला है। विचार के कारण आंखे बंद हैं। यही इस सूफी कथा का सार है।
साभार ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन, नई दिल्ली