बच्चे जन्म से सत्य रूप होते हैं। अगर उनको कभी असत्य नहीं सिखया जाय, असत्याचरण के लिए उन्हें प्रेरित नहीं किया जाय तो वे कभी असत्याचरण नहीं करेंगे। उनको बड़े लोग ही वैसी शिक्षा देते हैं। हालांकि वे कहकर शिक्षा नहीं देते। उनके व्यवहार में समाया असत्य ही बच्चों को असत्य का अभ्यास करा देता है। होता यूं है कि बच्चे बड़ों को देखकर सीखते हैं। बड़े लोग जैसा आचरण करते हैं, छोटे लोग उनका अनुकरण करते हैं।
गीता में कहा गया है- ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ ३/२१’, यहाँ ‘श्रेष्ठः’ का तात्पर्य बड़े लोगों को समझना चाहिए। बच्चों के लिए उनके अभिभावक ही श्रेष्ठ होते हैं। माता-पिता सबसे श्रेष्ठ और बड़े होते हैं। वे बच्चों के प्रथम शिक्षक होते हैं। इसलिए वे जैसा-जैसा आचरण करते हैं, वैसा ही अनुकरण बच्चे भी करते हैं।
आपने देखा होगा कि जिन घरों में गाली-गलौज का झगड़ालु माहौल होता है, उन घर के बच्चे बचपन से ही गालियां सीख जाते हैं जबकि शिष्टाचार भरा आचरण करने वाले परिवारों के बच्चे स्वभावतः शिष्टता का बरताव करते देखे जाते हैं। पण्डित के बच्चे बचपन से ही संस्कृत के मन्त्र बोलना सीख जाते हैं जबकि देर से उठने और निठल्ले समय गुजारने वालों के बच्चे स्वभावतः आलसी बनने लगते हैं। यह सब बड़ों को देखकर नकल की बात है।
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हमें स्वभाव से ही सत्यभाषी, सत्याचारी और सत्यान्वेषी होना चाहिए। हमें इस तथ्य पर सदा ध्यान रखना चाहिए कि जैसा हम करेंगे, वैसा ही हमारे बच्चे भी करेंगे। हम मांसाहारी होंगे तो हमारे बच्चे भी मांस भक्षण करेंगे। शराब पीने वालों के घर के बच्चे बचपन से ही शराब के संसर्ग में रहते हैं तो स्वाभाविक है कि वे आगे जाकर शराब पियेंगे। जिन घरों में व्यभिचार चलता रहता है, उन घर के बच्चे छोटी आयु में ही व्यभिचार देखते रहते हैं।
मनुष्य अधिकतम समय जिस चीज के संपर्क में होता है, उसी का अभ्यास क्रमशः होने लगता है। सपेरों के बच्चों में बाल्यकाल से ही साँपों से खेलने की हिम्मत देखी जाती है जबकि सामान्य घरों की सन्तानें सांपों के नाम मात्र से डरने लगते हैं। यह सब बड़ों द्वारा संपर्क और अभ्यास कराए जाने का परिणाम है।
साधना मार्ग में आगे बढ़ने वालों को इसी तथ्य के आधार पर सत्यान्वेषण और सत्यावलम्बन करना होता है ताकि अंग-अंग, रग-रग सत्याभ्यासी और सत्यानुप्राणित बने रहे। प्रयास करके सत्य बोलने या सत्यानुसन्धान करने के आवश्यकता न पड़े बल्कि सत्य तन-मन में ओतप्रोत रहे। जो भी आचरण हो, सत्यानुसार, सत्यानुकूल, सत्याधारित हो। महात्मा गाँधी ने तीन बंदरों का उदहारण इसी सत्य के आधार पर दिया है कि न असत्य देखो, न सुनो, न बोलो।
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मनुष्य के मन-मस्तिष्क में इन्हीं मार्गों से असत्य का प्रवेश होता है। या तो वह किसी के द्वारा किया हुआ असत्याचरण को देखता है, कहा हुआ असत्य को सुनता है अथवा देखा-सुना असत्य को अपने अभ्यास में लाकर बोलता है। ये तीनों-आँख, कान, मुख यदि असत्याचरण से बच जायें और सत्याश्रयी, सत्याभ्यासी हो जाएँ तो मनुष्य हरिश्चन्द्र और युधिष्ठिर बन सकता है।
कोई भी व्यक्ति सत्य के आश्रय रहकर सत्यनिष्ठ बन सकता है। हालाँकि कई परिस्थितियाँ ऐसी आ जाती हैं जिनमें सत्य बोलना हानिकर होता है, तो ऐसे हालातों में सामयिक लाभदायक असत्य का आश्रय लिया जा सकता है। परन्तु ऐसा कदाचित् होना चाहिए। ध्येय सर्वदा सत्याचरण पर होना चाहिए। साधना तभी बनती है। जो सत्य की साधना करता है, उसका जीवन सत्यमय हो जाता है। ऐसा सत्य, जिसके लिए सिक्ख महागुरुओं ने कहा है- जो बोले सो निहाल-सत् श्री अकाल।
हम सत्य इसलिए न बोलें कि हमें सत्यवादी कहलाना है बल्कि इसलिए बोलें और आचरण करें कि हमारा जीवन सत्यमय हो जाय और हमारे बच्चे सत्यावलम्बी हों।