किंशुक की कहानी, जिसे अपनी कुटिलता की कीमत कंपनी से बाहर जाने के रूप में चुकानी पड़ी।
संचित एक बड़ी कंपनी में सीनियर मैनेजर था। उसके साथ किंशुक भी काम करता था। संचित अपनी टीम के हर कर्मचारी को आगे बढ़ने का मौका देता था। वहीं किंशुक मौकापरस्त
आदमी था। वह खुद को संचित का छोटा भाई कहता था, पर उसके इरादे कुछ और ही थे। संचित अपना ध्यान टीम को प्रोत्साहित करने और कंपनी के उद्देश्यों को हासिल करने में लगाता था। जबकि किंशुक मौका पाकर अधिकारियों की चापलूसी करने का एक भी अवसर नहीं छोड़ता था।
धीरे-धीरे उसने सभी अधिकारियों के साथ अच्छी पैठ बना ली थी। एक बार कंपनी के एक अधिकारी संचित की टीम के एक सदस्य से नाराज हो गए। संचित ने टीम को तो समझाया ही, अधिकारियों से भी अपनी टीम के पक्ष में बात की। बस मौका देखते ही अधिकारियों ने संचित की जगह किंशुक को बिठा दिया। पद ग्रहण करते ही किंशुक ने सबसे पहले उस सदस्य को टीम से बाहर कर दिया, जिससे अधिकारी नाराज थे। जबकि संचित को दूसरा काम दे दिया गया।
किंशुक को लगने लगा कि अब तो वही राजा है, सारे निर्णय वही लेगा। उसने संचित के बनाए सारे नियम सिरे से खारिज कर दिए और नए नियम ले आया। लेकिन कुछ ही दिनों में जब अधिकारियों ने परखा, तो पाया कि कंपनी पहले के मुकाबले काफी नुकसान में चल रही है। उन्होंने किंशुक को कई बार चेतावनी दी। पर वह तो अधिकार के नशे में धुत्त था। लिहाजा किंशुक को कंपनी से बाहर कर दिया गया। दूसरी तरफ संचित अपने नए काम, और नई टीम के साथ लगातार सफलता के झंडे गाड़ता रहा। आगे चलकर कंपनी ने उसे न केवल प्रमोट किया, बल्कि उसकी बनाई गई नीतियों और नियमों को पूरी कंपनी में लागू कर दिया।