मुरली की कहानी, जो अहम और मनमानी के कारण अपने व्यवसाय से हाथ धो बैठा।
मास्टर जी छात्रों से बोले, सफल हो जाने के बाद ऐसा नहीं समझना चाहिए कि हमसे बढ़कर कोई नहीं। इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मेरा एक छात्र था, जिसका नाम था मुरली। मुरली बचपन से ही बहुत तेज था। उस वक्त बाजार में कंप्यूटर नया-नया आया हुआ था। मुरली ने बारहवीं पास करते ही अपना बिजनेस शुरू कर दिया। वह थोक के भाव में कंप्यूटर के अलग-अलग पुर्जे जैसे कि रैम, मदर बोर्ड, कीबोर्ड, माउस, कैबिनेट आदि खरीदता और उसे सस्ते दामों में भारतीय बाजार में बेचा करता था।
उससे पुर्जे खरीद कर छोटे-छोटे दुकानदार कंप्यूटर असेम्बल करते थे और बाजार में बेचा करते थे। कहा जाए, तो एक तरह से मुरली ने ही भारत में असेम्बल्ड कंप्यूटर के बाजार की शुरुआत की थी। कंप्यूटर बाजार में उसका इतना बड़ा नाम हो गया कि विदेशी कंपनियों से खरीद कर मुरली ही आधे भारत में कंप्यूटर के पुर्जे सप्लाई किया करता था। लेकिन फिर किसी ने उससे कहा कि काम सारा वह करता है, लेकिन सारी कमाई उन दुकानदारों को जाती है, जो पुर्जे जोड़कर कंप्यूटर बनाकर बेचते हैं।
दूसरे की बात सुनकर मुरली के मन में खटास आ गई। उसने पुर्जों के रेट बढ़ा दिए। रेट बढ़ने की वजह से मुरली को तो मुनाफा होने लगा, लेकिन दुकानदारों की बिक्री कम होने लगी। दुकानदारों ने मुरली को कई बार समझाने की कोशिश की, लेकिन मुरली अब बदल चुका था। पहले वह हर किसी की बात सुनता था, और हर किसी के साथ खड़ा हुआ करता था। लेकिन अब उसमें अहम आ गया था। उसे लगने लगा कि उसके सिवा उन दुकानदारों के पास कोई और विकल्प नहीं है। लिहाजा वह हर किसी पर अपनी मनमानी चलाने लगा। बस फिर क्या था, दुकानदारों ने मुरली का विकल्प ढूंढ लिया और कुछ ही दिनों में मुरली बाजार से बाहर हो गया।