बहुत से लोग धर्म को विश्वास का नाम भी दे देते हैं। पर धर्म विश्वास नहीं हो सकता क्योंकि विश्वास बदलते रहते हैं। विश्वास का संबंध मनुष्य की धरणाओं से होता है और धरणाओं का संबंध मान्यताओं से होता है। मान्यताएं जिस मन से निकलती हैं, वह भी बदलता रहता है। इसलिए जिन चीजों पर हम कभी विश्वास करते थे, ऐसी बहुत सी चीज़ों पर आज विश्वास नहीं करते।
जैसे एक समय तक विश्वास यह था कि पृथ्वी को एक बैल ने अपने एक सींग पर उठाया हुआ है और जब बैल थक कर पृथ्वी को एक सींग से दूसरे सींग पर ले आता है तो भूचाल आ जाता है। किसी समय यह भी विश्वास किया जाता था कि धरती चपटी है। आज कोई भी इस बात से इंकार नहीं कर सकता कि पृथ्वी गोल है।
आस्था विश्वास तो बदलते रहते हैं पर सत्य हम उसी को कहते हैं जो अपरिवर्तनीय है। और इसी सत्य की खोज को ही धर्म कहते हैं।आस्था-अनास्था से ऊपर, विश्वास और अंधविश्वास से ऊपर, अपनी बुद्धि की क्षमताओं और सीमाओं को समझते हुए जब मनुष्य उस निजता की खोज करता है, तो उसे धर्म कहते हैं। धर्म एक खोज है। खोज वही करेगा जो असंतुष्ट है।