शुरुआत से ही
बुद्ध ने संतुष्ट जीवन का निर्वाह किया। कोई भी सुख-सुविधा किसी भी समय उनकी
इच्छानुसार उनके सामने हाज़िर हो जाती थी। एक दिन उन्होंने कहा कि मुझे बाहर जाकर
दुनिया क्या है यह देखना है।
जब उन्होंने एक बीमार व्यक्ति, एक बूढ़े
व्यक्ति, और एक मरते व्यक्ति को देखा तो उन्होने जीवन के बारे में विचार करना शुरु
किया। यह तीन दृश्य उनको यह ज्ञान देने के लिए पर्याप्त थे कि जीवन में दुःख है।
रोगी को देखने के बाद बुद्ध ने कहा कि यह काफी है! मैने इसका अनुभव कर लिया है। एक
बूढ़े व्यक्ति और शव की झलक बुद्ध को यह कहने के लिए पर्याप्त थी कि असल में जीवन
में कोई आनंद नहीं है, मैं पहले ही मर चुका हूँ! जीवन का कोई अर्थ नहीं है। मुझे
वापस जाना होगा।
बुद्ध ने अकेले सत्य की तलाश शुरु की और इसके लिए उन्होनें
अपना महल, पत्नी और बेटे को छोड़ दिया। जितना गहरा मौन होगा उतने ही गहरे प्रश्न उस
मौन में उत्पन्न होंगे। उन्हे कुछ भी रोक नहीं सकता था। वे जानते थे कि दिन के समय
वे निकल नहीं पाएंगे इसलिए वे एक रात चुपचाप निकल गये। उनकी खोज कई वर्षो तक चलती
रही। उन्होनें वह सब कुछ किया जो लोगों ने उन्हे बताया, वे एक स्थान से दूसरे स्थान
पर गये, उपवास किया और कई धार्मिक पंथों पर चले इसके बाद वे चार सत्य जान
पाये।
पहला सत्य है कि, दुनिया में दुःख है। जीवन में सिर्फ दो संभावनाएं
हैं। पहला यह कि अपने आस-पास के संसार में औरों के दुःख के अनुभव को देख कर समझ
जाना। दूसरा यह कि स्वयं उसका अनुभव करके समझना कि संसार दुःख है। दूसरा सत्य यह है
कि दुःख के लिए कोई कारण होता है। जबकि बिना किसी कारण के भी सुखी रह सकते हैं।
तीसरा सत्य यह है कि दुःख का निवारण संभव है। चौथा सत्य यह है कि दुःख से बाहर
निकलने के लिए एक पथ है।
उस समय में इतनी अधिक समृद्धि थी कि बुद्ध ने अपने
मुख्य शिष्यों को भिक्षा का पात्र पकड़ा दिया और उनसे भिक्षा मांगने को कहा।
उन्होनें राजाओं के शाही वस्त्र उतरवाकर उनके हाथ में भिक्षा का कटोरा दे दिया। यह
इसलिए नहीं था कि उन्हें भोजन की आवश्यकता थी परंतु वे उन्हें कुछ होने से कुछ नहीं
होने के पाठ की सीख देना चाहते थे। यह बताना चाहते थे कि आप कुछ नहीं हैं, आप इस
विश्व में निरर्थक हैं। जब उस समय के राजाओं और ज्ञानियों को भिक्षा मांगने को कहा
गया तो वे करुणा के मूर्ति बन गये।
अपने सच्चे स्वभाव को देखें। आपका सच्चा
स्वभाव क्या है, वह शांति, करुणा, प्रेम, मित्रता, और आनंद है। मौन में इन सबका उदय
होता है। दुःख, पछतावा और कष्ट को मौन निगल लेता है और आनंद, करुणा एवं प्रेम को
जन्म देता है। इस तरह से, सभी आनंदित रह सकते हैं और दुःख के सागर को पार कर सकते
हैं।
स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय
मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर,
का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी
रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के
सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे
प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना
है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास
लेने की तकनीक) की खोज की।