हम सब इंसान हैं और हम सभी की
एक सीमा निर्धारित है। हमारे पास निश्चित समय और परिश्रम करने की क्षमता होती है।
अगर इन क्षमताओं का जरूरत से अधिक प्रयोग करेंगे तो कहीं न कहीं हमारी उत्पादकता पर
प्रभाव पड़ेगा और इसका नुकसान भी हमें ही उठाना पड़ेगा।
इसलिए अपनी
क्षमताओं को ध्यान में रखते हुए काम करना चाहिए। इसके लिए भले ही हमें अपने
दोस्तों, रिश्तेदारों अथवा कार्य क्षेत्र में सहकर्मियों एवं अधिकारियों से ना कहना
पड़े तो बेहिचक ना कहना सीखें, क्योंकि आमतौर बहुत से लोग ऐसा नहीं कर पाते हैं।
रोजमर्रा के जीवन में अक्सर ऐसी बातें हम सभी के साथ होती है कि नाते
रिश्तेदार कोई काम कह देते हैं। रिश्तेदारों के सम्मान एवं उनकी नाराजगी से बचने के
लिए न चाहते हुए भी हम हां कह देते हैं। नाते-रिश्तेदार हां सुनकर भले ही खुश हो
जाएं लेकिन अपना मन अंदर से परेशान हो जाता है।
जरूरी काम करते समय भी
बार-बार ख्याल आता है रिश्तेदार का काम है समय निकालकर उसे भी करना है। इससे हम
अपने जरूरी काम पर पूरा ध्यान नहीं दे पाते हैं क्योंकि दिमाग दो तरफ बंटा रहता है।
इस स्थिति में मानसिक तनाव बढ़ जाता है।
कार्य क्षेत्र में अपने ऊपर काम का
दबाव होने के बावजूद अगर अधिकारी ने एक और काम दे दिया तो मन को मारकर अधिकारी से
हां कह देते हैं। जबकि व्यवहारिकता यह है कि अधिकारी आपके व्यस्त होने के बाद भी
नया काम देते हैं उन्हें बताएं कि आपके पास वर्तमान में कितना काम है।
अगर
वह काम का दबाव जानने के बाद भी अतिरिक्त काम सौंपते हैं तो अधिकारी से प्राथमिकता
पूछ लें कि कौन सा काम ज्यादा जरूरी है। इससे मानसिक तनाव कम होगा और जो भी काम
करेंगे उसे अच्छी तरह पूरा कर पाएंगे।
शालीन और नम्र होना अच्छी बात है
लेकिन जरूरत से अधिक शालीन बनने पर लोग इसे व्यक्ति की कमजोरी समझने लगते हैं।
लोगों को लगता है कि अमुक व्यक्ति के पास पैसा है या खाली समय है तो उस पैसे और
खाली समय से अपना हित साधने की कोशिश करते हैं।
जब आप अपने चारों तरफा ना
की दीवार खड़ी कर देते हैं तो लोग किसी अन्य व्यक्ति की तलाश करते हैं जहां से उनका
हित पूरा हो सकता है। इसलिए भला बनने से ज्यादा जरूरी है कि व्यवहारिक बनें और
जरूरत के अनुसार ना भी कहें।