बुराई का स्वयं कोई अस्तित्व नहीं होता। भगवद्गीता में कहा गया है:‘‘अच्छाई का कभी नाश नहीं होगा; बुराई का कोई अस्तित्व हो नही सकता। ‘‘बुराई का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है; यह केवल दिखाई देती है। वैसे भी इसका अस्तित्व वास्तविक न होकर संबंधित है। जिस तरह अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं है ये कोई अलग तत्व नहीं है केवल प्रकाश का अभाव ही अंधकार है।
इसी तरह बुराई भी बस अच्छाई का अभाव है इसके आलावा पुराणों के अनुसार असुरों का अंत में भगवान में विलय हो गया; रावण का अंत में राम में विलय हो गया। यह सोच बुराई की दुविधा को हटाकर ईश्वर की सार्वभौमिकता का अनुभव करवाती है। अधिकतर धर्मों में यह दृष्टिकोण है कि ईश्वर सर्वव्यापी, सर्व़ज्ञानी और सर्व शक्तिमान है।
अगर ईश्वर सर्वव्यापी है तो बुराई के लिए ईश्वर से परे कोई स्थान ही नहीं है। यदि आप बुराई को एक अलग अस्तित्व की पहचान देते हैं तो आपको ईश्वर की सर्वव्यापकता के अस्तित्व को छोड़ देना होगा। यदि बुराई कोई अन्य शक्ति है जो इस सार्वभौमिकता से बाहर है या ईश्वर को चुनौती देती है तो ईश्वर सर्वशक्तिमान नहीं है। यदि वह सर्वव्यापी नहीं है और सर्वशक्तिमान नहीं है तो वह सर्वग्य भी नहीं है।
यदि बुराई का कोई स्वतंत्र अस्तित्व है तो ईश्वर अपने उन सभी ईश्वरीय गुणों को खो देते है जो ईश्वर में होने चाहिए। वेदांत कहते है कि बुराई का ईश्वर से बाहर कोई अस्तित्व नहीं हो सकता क्योंकि ईश्वर ही वह तत्व है जो इस ब्रह्मांड का कारण है। उदाहरण के रुप में एक मकड़ी अपनी लार से जाल बुनती है। एक मकड़ी, जाल का कारण, जाल से पृथक नहीं है; ठीक उसी प्रकार ब्रह्म इस ब्रह्मांड से अलग नहीं है।
इस्लाम मानता है कि सब कुछ ईश्वर का है, लेकिन वह ब्रह्मांड का कारण ईश्वर नहीं मानता। इस मूलभूत दार्शनिक अंतर का अर्थ है इस्लाम के अनुसार सैद्धांतिक रूप से शैतान का अस्तित्व ईश्वर से बाहर हो सकता है। लेकिन यदि ईश्वर इस ब्रह्मांड का कारण नहीं होता तो वेदांत कहते कि ईश्वर में सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञान होने की आवश्यक योग्यता संभव ही नहीं है।
वेदांत बुराई के स्वतंत्र अस्तित्व को खारिज करते हैं और यह कहते हैं कि यह दर्शन संबंधी विचार मात्र हैं। उदाहरण के लिए विष को खराब माना जाता है; लेकिन यह कुछ स्थितियों में अच्छा माना जाता हैः बहुत सी जीवन रक्षक औषधियों में विष होता है। उसी तरह ही विटामिन्स अच्छे हो सकते है, जीवन रक्षक भी हो सकते हैं लेकिन अधिक मात्रा में लेने से जानलेवा हो सकते हैं।
इसीलिए अच्छाई और बुराई केवल संबंधित हैं। सभी कुछ एक आभास है बुराई भी। प्रचूर मात्रा में सकारात्मक उर्जा आपमें उत्पन्न हो जाए तो आप सभी प्रकार की बुराई से बाहर निकल कर सत्य का अद्वैत के रुप में दर्शन कर सकते है। सूफी संतो को ये सिद्धांत लोगों को समझाने के लिए बड़ी कठिन परीक्षा से गुज़रना पड़ा।
अद्वैत दर्शन फिजि़क्स के क्वांटम सिद्धांत से मिलता-जुलता है। दोनों प्रणालियों में मूलभूत धारणा एक ही है; समस्त ब्रह्मांड एक ही तत्व से बना है। इस समझ से केवल एक वैज्ञानिक ही वेदांत की असली दिव्य धारणा को समझ सकता है। वेदांत कहता है कि ईश्वर ऊर्जा और विवेक है और विश्व, जो कि भौतिक है, उसी ऊर्जा का हिस्सा है।
एक वैज्ञानिक यह भी जानता है कि वास्तव में अच्छाई और बुराई का कोई अस्तित्व ही नहीं है। सभी एक दूसरे से जुड़े है। चाहे पारा या शीशा जैसा कोई विषैला पदार्थ हो या विटामिन जैसा अच्छा पदार्थ वैज्ञानिक उसके लिए कोई नैतिक पूर्व धारणा नहीं बनाता हैं।
वह उनको वैसा ही स्वीकार करता है और समझता है कि उनका कहां और कैसा प्रयोग है। प्रयोग ही किसी वस्तु को अच्छा या बुरा बनाती है। इसीलिए वेदांत की सोच बुराई और दिव्यता दोनों में वैज्ञानिक सोच है।
स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।