यदि आपका कभी ईश्वर से मिलना
हो तो जानते है आप उन्हें क्या कहेंगे? ‘‘अरे! मैं तो अपने भीतर आपसे मिल चुका हूं।
‘‘ईश्वर आप में नृत्य करते हैं उस दिन जिस दिन आप हंसते और प्रेम में होते हो। सुबह
हंसना ही सच्ची प्रार्थना है। सतही हंसना नही बल्कि अंदर की गहराई से हंसना। हंसना
आपके भीतर से आपके हृदय से आती है। सच्ची हंसी ही सच्ची प्रार्थना है। जब आप हंसते
हो तो सारी प्रकृति आपके साथ हंसती है। यही हंसी प्रतिध्वनि होती है और गूंजती है,
यही वास्तविक जीवन है। जब सब कुछ आपके अनुसार हो रहा हो तो कोई भी हंस सकता है,
लेकिन जब आपके विपरीत हो रहा हो और आप हंस सके तो समझो विकास हो रहा है। तो आपके
जीवन में आपकी हंसी से मूल्यवान और कुछ नही। चाहे जो हो जाये इसे किसी के लिये खोना
नही है।
घटनाएं आती हैं और जाती है। कुछ तो सुखद होगी और कुछ दुखद, लेकिन जो
कुछ भी हो आप को वे छु न पाये। आपके अस्तित्व के भीतर ऐसा कुछ है जो कि अनछुआ है।
उस पर ही रहे जो अपरिवर्तनशील है। तभी आप हंसने के योग्य होंगे। हंसने में भी भेद
है। कभी-कभी आप अपने आप को नही देखने के लिये या कुछ सोचने से बचने के लिये हंसते
हो। लेकिन जब आप हर क्षण यह देखते हो और अनुभव करते हो कि जीवन हर क्षण है और जीवन
का हर क्षण अपराजेय है तो आपको कोई परेशान नही कर सकता।
आपने एक नवजात हो
देखा होगा, छ माह का या एक वर्ष का। जब वे हंसते हैं तो उनका पूरा शरीर हिलता और
कूदता है। उनकी हंसी उनके मुंह से ही नही आती, उनके शरीर का हर एक कण हंसता है। यह
समाधि है। यह हंसी अबोध है, शुद्ध है, बिना किसी तनाव की है। हंसी हमें खोलती है,
हमारे दिल को खोलती है। और जब हम इस अबोधता को प्राप्त नही हो पाते तो क्या करे? आप
पूछे -‘‘मैं उस मुक्ति को या अबोधता को अनुभव नही कर पा रहा हूं। मैं क्या करुं? ‘‘
आपके अस्तित्व के कई स्तर हैं। पहला, शरीर- ध्यान रखे कि आपने पूरा विश्राम किया
है, सही भोजन किया है और कुछ व्यायाम किया है। फिर श्वास पर ध्यान
दें।
श्वास की अपनी एक लय है। मन की प्रत्येक स्थिति के लिये श्वास की एक
निश्चित लय है। श्वास की उस लय को प्राप्त करके तन और मन दोनो को ऊपर उठाया जा सकता
है। तब आप उन धारणाओं और विचारों को देखें जो कि आप मन में सदैव बने रहते हैं।
अच्छे, बुरे, सही, गलत, ऐसा करना चाहिये, ऐसा नही करना चाहिये ये सब आपको बांध लेते
हैं। हर विचार किसी ना किसी स्पंदन या भावना से जुड़ा है। स्पंदनों को देखें और
शरीर में अनुभव को देखें। भावना की लय को देखें- यदि आप देखेंगे तो आप कोई गलती नही
करेंगे। आप के पास एक ही तरह की भावनाओं का पथ है, लेकिन आप इन भावनाओं को अलग
कारणों से, अलग-अलग वस्तुओं से, अलग अलग लोगों से, स्थितियों-परिस्थितियों से जोड़
लेते हो।
एक विचार को विचार के रुप में ही देखें, एक भावना को भावना के रुप
में ही देखे तब आप खुल जायेगें अपने आप में ईश्वरत्व को देख पाएंगे। देखना इन्हें
अलग-अलग परिणाम देता है। जब आप नकारात्मकता को देखते हैं तो ये तुरंत समाप्त हो
जाती है और जब आप सकारात्मकता को देखते हैं तो वे बढ़ने लगती हैं। जब आप क्रोध को
देखेंगे तो यह समाप्त हो जाएगा और जब आप प्रेम को देखेंगे तो यह बढ़
जायेगा।
यही सर्वोत्तम और एकमात्र उपाय है। आने वाले हर विचार को देखें और
उन्हें जाते हुये देखें। नकारात्मक विचारों के आने का एकमात्र कारण तनाव है। यदि आप
किसी दिन बहुत तनाव में हों तो उसके अगले दिन या उस से अगले दिन आप में नकारात्मक
विचार आने लगेंगे और आप परेशान हो जाएंगे। इन विचारों से, जिनका कोई अर्थ नही है,
पीछा छुड़ाने के स्थान पर आप उन बिंदुओं को, कारणों को खोजें जिनके कारण ये विचार आ
रहे हैं। यदि स्रोत स्वच्छ है तो मात्र सकारात्मक विचार ही आएंगे। यदि नकारात्मक
विचार आते है तो आप ये मान ले, ‘‘तो क्या।‘‘ वे आयेंगे और तुरंत गायब हो जाएंगें।
हमें जो जैसा है उसे वैसा ही देखने की आवश्यकता है, विषय और पूर्णता के साथ। यह
जीवन के लिये सारभूत है। जब आप में ऐसा होने लगे तो आपके जीवन में सही अर्थों में
हंसी जन्म लेगी।
स्रोतः आर्ट
ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट
ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के
पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए
इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में
से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों
का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास
लेने की तकनीक) की खोज की।