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आशाराम बापू को मिल गये गुरू

Sat, 13 Jul 2013 12:05 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क।
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‘नामचिंतामणि’ ग्रंथ में गुरुओं के बारह प्रकार बताये हैं। एक होते हैं धातुवादी गुरु। ‘बच्चा! मंत्र ले लिया, अब जाओ तीर्थाटन करो। भिक्षा माँग के खाओ अथवा घर का खाओ तो ऐसा खाओ, वैसा न खाओ। लहसुन न खाना, प्याज न खाना, यह करना, यह न करना। इस बर्तन में भोजन करना, ऐसे सोना।’ - ऐसी विभिन्न बातें बताकर अंत में ज्ञानोपदेश देनेवाले धातुवादी गुरु होते हैं।
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दूसरे होते हैं चंदन गुरु। जिस प्रकार चंदन वृक्ष अपने निकट के वृक्षों को भी सुगंधित बना देता है, ऐसे ही अपने सान्निध्य द्वारा शिष्य को तारने वाले गुरु चंदन गुरु होते हैं। चंदन गुरु वाणी से नहीं, आचरण से हममें संस्कार भर देते हैं। उनकी सुवास का चिंतन करके हम भी अपने समाज में सुवासित होने के काबिल होते हैं।

तीसरे होते हैं विचार प्रधान गुरु। जो सार है वह ब्रह्म-परमात्मा है, असार है वह प्रकृति का शरीर। प्रकृति का शरीर प्रकृति के नियम से रहे लेकिन आप अपने ब्रह्म-स्वभाव में रहें - इस प्रकार का विवेक जगाने वाले आत्म-विचार प्रधान गुरु होते हैं।
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चौथे होते हैं अनुग्रह-कृपा प्रधान गुरु। अपनी अनुग्रह-कृपा द्वारा अपने शिष्यों का पोषण कर दें, दीदार दे दें, मार्गदर्शन दे दें; अच्छा काम करें तो प्रोत्साहित कर दें, गड़बड़ करें तो गुरु की मूर्ति मानो नाराज हो रही है ऐसे गुरु भी होते हैं।

पाँचवें होते हैं पारस गुरु। जैसे पारस अपने स्पर्श से लोहे को सोना कर देता है, ऐसे ही ये गुरु अपने हाथ का स्पर्श अथवा अपनी स्पर्श की हुई वस्तु का स्पर्श कराके हमारे चित्त के दोषों को हरकर चित्त में आनंद, शांति, माधुर्य एवं योग्यता का दान करते हैं।

छठे होते हैं कूर्म अर्थात् कच्छप रूप गुरु। जैसे मादा कछुआ दृष्टि मात्र से अपने बच्चों को पोषित करती है, ऐसे ही गुरुदेव कहीं भी हों अपनी दृष्टिमात्र से, नूरानी निगाह मात्र से शिष्य को दिव्य अनुभूतियाँ प्रदान कराते रहते हैं। ऐसे गुरुदेव की कृपा का अनुभव मैंने कई बार किया।

सातवें होते हैं चन्द्र गुरु। जैसे चन्द्रमा के उगते ही चन्द्रकांत मणि से रस टपकने लगता है, ऐसे ही गुरु को देखते ही हमारे अंतः करण में उनके ज्ञान का, उनकी दया का, आनंद, माधुर्य का रस उभरने, छलकने लगता है। गुरु का चिंतन करते ही, उनकी लीलाओं, घटनाओं अथवा भजन आदि का चिंतन करके किसी को बताते हैं तो भी हमें रस आने लगता है।

आठवें होते हैं दर्पण गुरु। जैसे दर्पण में अपना रूप दिखता है ऐसे ही गुरु के नजदीक जाते ही हमें अपने गुण-दोष दिखते हैं और अपनी महानता का, शांति, आनंद, माधुर्य आदि का रस भी आने लगता है, मानो गुरु एक दर्पण हैं। गुरु के पास गये तो हमें गुरु का स्वरूप और अपना स्वरूप मिलता-जुलता, प्यारा-प्यारा लगता है। वहाँ वाणी नहीं जाती, मैं बयान नहीं कर सकूँगा। मुझे जो अनुभूतियाँ हुईं उनका मैं वर्णन नहीं कर सकता। बहुत समय लगेगा फिर भी पूरा वर्णन नहीं कर पाऊँगा।

नौवें होते हैं छायानिधि गुरु। जैसे एक अजगैबी देवपक्षी आकाश में उड़ता है और जिस व्यक्ति पर उसकी ठीक से छाया पड़ जाती है वह राजा बन जाता है ऐसी कथा प्रचलित है। यह छायानिधि पक्षी आकाश में उड़ता रहता है किंतु हमें आँखों से दिखाई नहीं देता। ऐसे ही साधक को अपनी कृपाछाया में रखकर उसे स्वानंद प्रदान करनेवाले गुरु छायानिधि गुरु होते हैं। जिस पर गुरु की दृष्टि, छाया आदि कुछ पड़ गयी वह अपने-अपने विषय में, अपनी-अपनी दुनिया में राजा हो जाता है। राजे-महाराजे भी उसके आगे घुटने टेकते हैं। यह सामर्थ्य मेरे गुरुदेव में था और मुझे लाभ मिला।  

दसवें होते हैं नादनिधि गुरु। नादनिधि मणि ऐसी होती है कि वह जिस धातु को स्पर्श करे वह सोना बन जाती है। पारस तो केवल लोहे को सोना करता है। ऐसे गुरु मुमुक्षु की करुण पुकार सुन कर उस पर करुणा करके उसे तत्क्षण ज्ञान दे देते हैं। मुमुक्षु के आगे स्वर्ण तो क्या है, हीरे क्या हैं, राज्य क्या है? वह तो राज्य और स्वर्ण का दाता बन जाता है। नादनिधि मणि से भी उन्नत, गुरु की कृपा और गुरु का ज्ञान काम करता है।

नादनिधि को तो मैं चमत्कारी मानता हूँ लेकिन उससे भी कई गुना चमत्कारी मेरे गुरुदेव की वाणी और कृपा है। मैं उनके चरणों में अब भी नमस्कार करता हूँ। मेरे गुरुदेव की पूजा के आगे नादनिधि मणि, चिंतामणि, पारसमणि कुछ भी नहीं है। पारसमणि वालों के पास इतने लोग नहीं होते हैं।

ग्यारहवें गुरु होते हैं क्रौंच गुरु। जैसे मादा क्रौंच पक्षी अपने बच्चों को समुद्र-किनारे छोड़कर उनके लिए दूर स्थानों से भोजन लेने जाती है तो इस दौरान वह बार-बार आकाश की ओर देखकर अपने बच्चों का स्मरण करती है। आकाश की ओर देख कर अपने बालकों के प्रति सद्भाव करती है तो वे पुष्ट हो जाते हैं। ऐसे ही गुरु अपने चिदाकाश में होते हुए अपने शिष्यों के लिए सद्भाव करते हैं तो अपने स्थान पर ही शिष्यों को गुदगुदियाँ होने लगती हैं, आत्मानंद मिलने लगता है और वे समझ जाते हैं कि बापू ने याद किया, गुरु ने याद किया।

ऐसी गुरुकृपा का अनुभव मुझे कई बार हुआ था। मैंने अनुभव किया कि ‘गुरुजी कहीं दूर हैं और मेरे हृदय में कुछ दिव्य अनुभव हो रहे हैं।’ मन में हुआ कि ‘कैसे हो रहा है?’ तो तुरंत पता चला कि वहाँ से उनका सद्भाव मेरी तरफ यहाँ पहुँच गया है।
 
बारहवें गुरु होते हैं सूर्यकांत गुरु। सूर्यकांत मणि में ऐसी कुछ योग्यता होती है कि वह सूर्य को देखते ही अग्नि से भर जाती है, ऐसे ही अपनी दृष्टि जहाँ पड़े वहाँ के साधकों को विदेह मुक्ति देनेवाले गुरु सूर्यकांत गुरु होते हैं। शिष्य को देखकर गुरु के हृदय में उदारता, आनंद उभर जाय और शिष्य का मंगल-ही-मंगल होने लगे, शिष्य को उठकर जाने की इच्छा ही न हो। गुरु का अपना स्वभाव ही बरसने लगे। तीरथ नहाये एक फल... अपनी भावना का ही फल मिलेगा। संत मिले फल चार... धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष मिलेगा लेकिन आत्मसाक्षात्कारी पुरुष में तो मुझे लगता है कि बारह-के-बारह लक्षण चमचम चमकते हैं।

किसी गुरु में एक लक्षण, किसी में दो, किसी में तीन लेकिन ब्राह्मी स्थितिवाला तो ओ हो! जय लीलाशाह भगवान! जय व्यास भगवान!! ऐसे ब्रह्मवेत्ता महापुरुषों के चरणों में वंदन! उनका बड़ा भारी उपकार है, उनका धरती पर रहना ही मनुष्यों के लिए मंगलकारी है। वे बोलें तो भी मंगल है, ऐसे ही कहीं चुप बैठें और केवल दृष्टि डाल दें तो भी उनके संकल्प और उनको छूकर आनेवाली हवाओं से मंगल होता है।

एक गुरु में ऐसे बारह-के-बारह दिव्य गुण भी हो सकते हैं, दो भी हो सकते हैं, चार भी हो सकते हैं। अब आपको कितने प्रकार के गुरु मिले हैं, आप ही सोच लो। मुझे तो मिल गये मेरे गुरुदेव। यह सब उन्हीं का विस्तार है और जो दिखता है उससे भी ज्यादा विस्तार है उनका। जहाँ-जहाँ आपकी और मेरी दृष्टि जाती है उससे भी ज्यादा विस्तार है। अनंत ब्रह्मांड भी उनके एक कोने में पड़े हैं। ऐसे हैं मेरे गुरुदेव!

ऐसे गुरुओं पर कीचड़ उछालने वाले हर युग में रहे, फिर भी गुरु-परम्परा अभी तक बरकरार है। नानकजी को जेल में डाल दिया। कबीरजी पर लांछन लगाया। बुद्ध पर दोषारोपण किया, कुप्रचार किया। संत नामदेव, ज्ञानेश्वर महाराज का भी खूब कुप्रचार हुआ। संत तुकारामजी महाराज का भी खूब कुप्रचार हुआ। फिर भी वे संत लाखों-करोड़ों के हृदय में अभी भी आदर से विराजमान हैं। लाखों-करोड़ों हृदय उन्हें आदर से मानते हैं। निंदक और कुप्रचारक अपना ही घाटा करते हैं।
साभारः ‘ऋषि प्रसाद’ विभाग, संत श्री आसारामजी आश्रम

संत श्री आशारामजी बापू परिचय
संत श्री आशारामजी बापूजी न केवल भारत को अपितु सम्पूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से तृप्त कर रहे हैं। संत श्री आसारामजी बापू का जन्म सिंध प्रान्त के नवाबशाह ज़िले में बेराणी गाँव में नगर सेठ श्री थाऊमलजी सिरुमलानी के घर 17 अप्रैल 1941 को हुआ। देश-विदेश में इनके 410 से भी अधिक आश्रम व 1400 से भी अधिक श्री योग वेदांत सेवा समितियाँ लोक-कल्याण के सेवाकार्यों में संलग्न हैं।

गरीब-पिछड़ों के लिए ‘भजन करो, भोजन करो, रोजी पाओ’ जैसी योजनाएं, निःशुल्क चिकित्सा शिविर, गौशालाएं, निःशुल्क सत्साहित्य वितरण, नशामुक्ति अभियान आदि सत्प्रवृत्तियां भी आश्रम व समितियों द्वारा चलायी जाती है। आशा राम बापू जी भक्तियोग, कर्मयोग व ज्ञानयोग की शिक्षा से सभी को स्वधर्म में रहते हुए सर्वांगीण विकास की कला सिखाते हैं।
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