हमारी दृष्टि केवल बाहरी संसार में फैले हुए सुख को देखती है। उससे प्रभावित होकर उसमें ही जीवन के रस खोजती है, जबकि सच्चाई यह है कि हमारे भीतर उससे भी मूल्यवान रस छिपा हुआ है। पर हम उस और ध्यान ही नहीं देते। उसे जानने की ललक कभी मन में उठती ही नहीं है। दरअसल, जो बाहर दिखता है, उसे बीज हमारे भीतर विद्यमान हैं। मनुष्य ने प्रकृति के विस्तार में से बहुत कुछ खोजा व पाया है। यह पुरुषार्थ और मनोयोग का ही फल है। मनुष्य अगर यही प्रयास अंतरंग की खोज में लग सकें, तो बाहरी सुख से मूल्यवान भी कुछ पाया जा सकता है। हम अपने को देखें, परखें, खोजें, अपना विश्लेषण करें व अंतर्निहित विभूतियों का साक्षात्कार करें, तो प्रतीत होगा कि जो हमारे लिए नितांत आवश्यक है, वह हमारे भीतर ही मौजूद है। यह वैभव इतना अधिक समर्थ व सशक्त है कि यदि उसे ठीक तरह नियोजित किया जाए, तो मनुष्य का वैभव फैल जाएगा और मन शांत होगा।