कोई कहे कि तीर्थों में पहुंचते ही व्यक्ति का मनोभाव बदल जाता था, उससे फिर कोई बुरा काम संभव ही नहीं होता था, तो उस बात पर आज यकायक विश्वास करते नहीं बनेगा। तीर्थ पुरानी सभ्यता के खोजें हुए बहुत गहरे, सांकेतिक, और अनूठे आविष्कार है। लेकिन उन्हें समझने के सब रूप खो गए है।
सिर्फ एक मुर्दा व्यवस्था रह गई है। हम उसको ढोए चले जा रहे है। बिना यह जाने कि वह क्यों निर्मित हुए, क्या उनका उपयोग किया जाता रहा। किन लोगों ने उन्हें बनाया क्या प्रयोजन था? पहली बात तो यह समझ लेनी चाहिए कि हमारी सभ्यता ने तीर्थ का अर्थ खो दिया है।
इसलिए जो आप तीर्थ को जाते है वह भी करीब-करीब व्यर्थ जाते है। जो उसका विरोध करते है वह भी करीब-करीब व्यर्थ विरोध करते है। बल्कि विरोध करने वाला ही ठीक मालूम पड़ता है। वह भी ना समझ होने पर समझदार मालूम होता है। सही बात का उसे भी कुछ पता नहीं है। वह जिस तीर्थ का विरोध कर रहा, वह तीर्थ की धारणा नहीं है। यद्यपि वह तीर्थ जानेवाला जिस तीर्थ में जा रहा है वह भी तीर्थ की धारणा नहीं है।
तीर्थ असल में वैसी जगह है, जहां से चेतना की एक धारा अपने आप प्रवाहित हो रही हो। जिसको प्रवाहित करने के लिए सदियों से मेहनत कि गई हो। आप सिर्फ उस धारा में खड़े हो जाएं और आपकी चेतना सिर्फ तैयार भर हो जाए तो आप एक यात्रा पर निकल जाएं।
जितनी मेहनत अकेले करनी पड़ सकती है उससे बहुत अल्प मेहनत में यात्रा संभव हो सकती है। अब जैसे अगर आप किसी ऐसी जगह में साधना कर रहे है जहां चारों और नकारात्मक भावावेश प्रवाहित होते है। ऐसी जगह आंतरिक यात्रा कठिन हो जाएगी।