प्रोफेसर आदेश हर रोज क्लास में कुछ नया सिखाते थे। आखिर वह मनोवैज्ञानिक जो थे। जब वह क्लास में घुसे, तो मुस्करा रहे थे। वत्सला ने पूछा, सर आज आप बहुत खुश दिख रहे हैं। कुछ खास बात है क्या? प्रोफेसर बोले, हां खास तो है। आज मैं एक बहुत अच्छे युवा से मिला। उसकी सोच ने मुझे प्रभावित किया।
प्रोफेसर बोले, मैं रोज मेट्रो से राजीव चौक से दिल्ली यूनिवर्सिटी आता हूं। आम तौर पर मेट्रो भरी ही रहती है, इसलिए सीट प्रायः नहीं मिलती। आज पता नहीं क्या सूझा, मैं घर से पैदल ही स्टेशन चला गया। अब पैंसठ की उम्र में इतना कोई चले तो थकान हो ही जाती है।
कभी-कभी मेट्रो में वृद्ध व्यक्तियों वाली सीट मिल जाया करती है। सोचा, शायद आज भी मिल जाएगी। पर मैंने देखा कि दो बुजुर्ग पहले से ही सीट पर बैठे हुए थे। बाकी सीटों पर बैठे लोगों से तो कोई उम्मीद ही नहीं करनी चाहिए। लेकिन आज कुछ अलग ही हुआ।
मैं जहां खड़ा था, वहां एक युवक बैठा हुआ था। मुझे देखते ही वह खड़ा हो गया और अपनी सीट देने लगा। मैंने कहा कि यह सीट तो वृद्धों के लिए नहीं है। वह बोला, बड़ों का आदर करना मुझे बचपन से सिखाया गया है। यह सीट बुजुर्गों के लिए नहीं है, तो क्या हुआ? आप हमसे बड़े हैं। वत्सला ने पूछा, फिर क्या हुआ सर? प्रोफेसर मुस्कराते हुए बोले, देखा, आपको भी लगा न कि इसमें क्या बड़ी बात है! मैं भी यही सोच रहा था कि इसमें कौन-सी बड़ी बात है।
तभी मेरे बगल में बैठी एक महिला, जो शायद उम्र में मुझसे थोड़ी बड़ी होगी, बोली, ऐसे बच्चे आज कहां मिलते हैं! वह बिल्कुल सच कह रही थी। वृद्धों और महिलाओं के लिए दो-दो सीट हर कंपार्टमेंट में इसीलिए दी गई है कि उन्हें परेशानी न हो। हालत यह है कि अगर कोई वृद्ध या महिला किसी सामान्य सीट पर बैठना चाहे, तो उसे पैनी नजर से देखा जाता है कि पहले ही ये दो-दो सीटें खा चुके हैं, और अब यह भी मांगने आ गए। बस मैं यही सोचकर मुस्करा रहा था।
इस दौर में भी संस्कारों का पालन करने वाले लोग कम नहीं हैं।