मंदिर में प्रवेश तो उसी का होता है, जो मन को बाहर ही छोड़ जाता है। अगर आप मन को मंदिर के द्वार पर नहीं रख गये, तो आप मंदिर में कभी प्रविष्ट नहीं होते हैं। ऐसे आप जा-आ सकते हैं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। और मन सूक्ष्म रास्ते खोजता है। सूक्ष्म रास्ते मन के बड़े जटिल हैं और पकड़ में नहीं आते।
अगर कोई आपसे कहे कि अंहकार छोड़ दो, तो आप अहंकार छोड़ने लगते हैं और विन्रमता पकड़ने लगते हैं। और एक दिन ऐसा आ जाता है कि आप कहते हैं कि इस पृथ्वी पर मुझसे ज्यादा विन्रम कोई भी नहीं है। अहंकार पीछे से आ गया वापस।
सुना है मैंने, जंगल में रहनेवाले एक तपस्वी संन्यासी के पास एक व्यक्ति गया और उसने कहा कि ‘हे संन्यासी आप तो, भीड़-भाड़ से दूर जंगल में आ गये! और मैंने सुना है कि आप किसी को शिष्य भी नहीं बनाते। आपको कोई शिष्यों का मोह नहीं है। सुना है मैंने, आप कोई प्रसिद्धि की आकांक्षा भी नहीं रखते हैं, कोई यश की कामना भी नहीं करते। और भी मैंने संन्यासी देखे है।’ दो-चार संन्यासी की उसने बात कही।
और वह जो त्यागी पुरुष था, उसकी रीढ़ सीधी हो गयी, उसकी आंखों में चमक आ गयी, चेहरे पर रौनक आ गयी। उसने कहा कि बिलकुल ठीक कहते हो। अरे, वे भी कोई संन्यासी हैं, जो यश चाहते हैं, पद-प्रतिष्ठा चाहते हैं! एक मुझको देखो, जो एकांत जंगल में बैठा हूं। न पद की कोई आकांक्षा है, न यश की कोई आकांक्षा है; कोई आए तो ठीक, कोई न आए तो ठीक।
अब यह आदमी सूक्ष्म रास्ते से वापस लौट गया। इसे भी इसने पद बना लिया कि इधर मैं बैठा हूं अकेले में। इस ऊंचाई पर कोई भी नहीं बैठा है, जहां मैं बैठा हूं-भीड़-भाड़ से दूर। कोई इच्छा ही नहीं है कि कोई मेरे संबंध में जाने। लेकिन भीतर यह इच्छा जरूर होगी कि लोग जानें कि मेरी कोई इच्छा नहीं है, कि कोई मेरे संबंध में जाने। यह सूक्ष्म है और घूम कर आदमी को वापस वहां खड़ा कर देती है, जहां से मनुष्य आपने को दूर रखना चाहता है।
साभार: ओशो वर्ल्ड फाउंडेशन