बायजीद अपनी कुटिया में ध्यान में लीन थे। ध्यान के समय उनसे कोई भी मिलने नहीं आ सकता था। मगर एक अतिथि, जिसे इसका पता नहीं था, उनके पास आया और बाहर से उन्हें पुकारने लगा। वह जानना चाहता था कि ध्यानमग्न कैसे हुआ जाए? उसने दरवाजे के बाहर से ही पूछा। कोई जवाब नहीं मिलने पर वह जोरों से दरवाजा पीटने लगा। उसने जोर से चिल्लाकर पूछा, अंदर कौन है? मगर कोई उत्तर नहीं आया। फिर वह चुपचाप प्रतीक्षा करने लगा।
शाम के वक्त जब बायजीद बाहर निकले, तो उस आदमी ने खुश होकर ध्यान के बारे अपनी जिज्ञासा उनके सामने रखी। इस बार भी कोई उत्तर नहीं आया, तो उसने अपना सवाल दोहराया। बायजीद कुछ कहते, इससे पहले लगे हाथों उलाहना भी दिया, मैंने आपको बहुत पुकारा। कई बार आवाजें लगाईं, पर आपने तो जवाब ही नहीं दिया।
इस पर बायजीद ने मुस्कराते हुए कहा, मैं तो कुटिया के भीतर ही था। उस व्यक्ति ने पूछा, क्या आपको मेरी आवाज सुनाई नहीं पड़ी थी? बायजीद ने कहा, सुनाई पड़ी थी। तुम्हारा सवाल भी सुना था। तुम्हारा सवाल था कि अंदर कौन है। उस व्यक्ति ने रुंआसा होकर कहा कि फिर भी दरवाजा नहीं खुला। आपने जवाब तक नहीं दिया। बायजीद ने कहा, तुम्हारा प्रश्न था, कौन है? मुझे उसका जवाब खोजने के लिए अपने भीतर जाना पड़ा। सो उसी में देर हो गई।
तब तक वहां कई लोग जमा हो गए। बायजीद का प्रवचन शुरू हो गया। लेकिन थोड़ी ही देर बाद जबर्दस्त आंधी-तूफान आया। सब अपनी जान बचाने इधर-उधर दौड़े। वह अतिथि भी भागा।पर बायजीद को वहीं बैठे देख वापस लौट आया। वह फकीर के चरण पकड़ कर बोला, इस तूफान में सब भागे, पर आप नहीं। ऐसा क्यों? फकीर ने कहा, जब सब बाहर की ओर भागे, तब मैं भीतर चला गया, अपने ही ध्यान में। वहां कोई तूफान नहीं था। वहां परम शांति थी। अतिथि ने खुश होते हुए कहा, मुझे ध्यान का तरीका मिल गया।