अगर हम जीवन को सौ वर्ष का भी मानें तो इसमें से पच्चीस वर्ष तो बचपन के, बारह से पन्द्रह वर्ष बीमारी में, दुःख में, पीड़ा में बीत जाते हैं। वैसे बचपन का समय जितना कीमती होता है, उसकी कोई सीमा नहीं होती।
इसका एक सबसे बड़ा कारण यह है कि युवा भविष्य के सपने देखता है और वृद्घ अतीत में जीता है। बचपन ही एक ऐसा अवसर है जब व्यक्ति वर्तमान में रहता है, इसीलिए प्रसन्न भी रहता है, आनन्दित रहता है, खिलखिलाता रहता है, मुस्कराता रहता है। खुद भी हंसता है और दूसरों को भी हंसाता है, खुशी देता है।
लेकिन सारी उम्र बचपन तो रह नहीं सकता, लेकिन बचपन वाला मन जरुर रह सकता है। हर दिन की सुबह बचपन जैसी सुहावनी होती है, दोपहर आते-आते व्यक्ति बदलता जाता है, उसे कुछ खुमारी सी आती है, फिर दिन ढलता है।
आदमी भी थकावट महसूस करने लगता है, शाम होती है, फिर रात में आदमी शयन में चला जाता है। इस तरह से हर दिन में एक पूरी जिंदगी की झलक आप देख सकते हैं।