स्वामी विवेकानंद को तब ज्यादा लोग नहीं जानते थे। जो जानते थे, वे भी ठाकुर के शिष्य होने के नाते। उन्होंने रास्ते में देखा कि एक मंदिर बन रहा है। सामने से गुजरते हुए मन में न जाने क्या विचार आया कि उन्होंने बन रहे मंदिर के सीमा क्षेत्र में प्रवेश किया। मजदूर, राज, कारीगर, मिस्त्री और बढ़ई वहां काम कर रहे थे। एक ओर बैठे काम कर रहे मजदूर के पास जाकर विवेकानंद ने पूछा, भाई क्या कर रहे हो? देखते नहीं, पत्थर तोड़ रहा हूं! मजदूर ने कहा।
स्वामीजी ने विनम्रता से ही पूछा था, परंतु उत्तर जिस तल्खी से आया था, उससे लगा कि काम करने वाला तेज मिजाज है। वह किसी बात को लेकर दुखी है। स्वामी जी कुछ और आगे बढ़े। दूसरे मजदूर के पास जाकर भी उन्होंने वही प्रश्न किया। मजदूर ने जो उत्तर दिया, वह पहले जैसा तो नहीं था, पर यह जरूर लगता था कि उसे काम करने में कोई आनंद नहीं आ रहा है। उसने कहा था, भैया! पेट के लिए काम कर रहा हूं। उसकी वाणी में विवशता की बोझिलता और अनुत्साह का फीकापन था।
इन दोनों मजदूरों से हुई बातचीत को बाद में किसी प्रसंग पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा था, पहले और दूसरे मजदूर के उत्तर में मुझे एक विशेष अंतर दिखाई दिया। एक जहां जबर्दस्ती लादी गई मजदूरी की तरह काम कर रहा था, तो दूसरा विवशता के कारण पत्थर तोड़ रहा था। परंतु पहले मजदूर की अपेक्षा दूसरा मजदूर कम दुखी, कम निराश और कम उद्विग्न दिखाई दे रहा था।
स्वामीजी एक और मजदूर के पास गए। वह बड़े उत्साह, शक्ति और सुघड़ता से पत्थर तोड़ रहा था। स्वामीजी ने उससे भी पूछा, भाई, यहां क्या हो रहा है और तुम क्या कर रहे हो? मजदूर ने बिना हाथ रोके स्वामीजी की ओर देखा। उसकी आंखों में आह्लाद की एक चमक और आनंद की दीप्ति नाच रही थी। उसी भाव को व्यक्त करते हुए उसने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया, यहां भगवान का मंदिर बन रहा है और मैं मंदिर के लिए ही काम कर रहा हूं।