पुरूष भले ही कई स्त्रियों से संबंध रखे लेकिन स्त्री का किसी दूसरे पुरूष से संपर्क होने पर उसे गलत नजरों से देखा जाने लगता है। स्त्रियों के लिए नियम बनाया गया है कि वह अपने पति के अलावा किसी अन्य के प्रति अनुराग की भावना मन में नहीं लाए। जो स्त्री ऐसा करती है उसे पतिव्रता कहा जाता है।
महाभारत काल में महाराज द्रुपद की पुत्री द्रौपदी का विवाह पांच पुरूषों के साथ हुआ था। पांच पुरूषों के साथ संबंध बनाने के बावजूद द्रौपदी को सीता के समान पतिव्रता कहा गया है।
इसका कारण मात्र एक है कि, द्रौपदी पांचों पुरूषों की व्याहता पत्नी थी। द्रौपदी ने कभी भी अपने पांच पतियों के अलावा किसी और की ओर अनुराग प्रदर्शित नहीं किया। कीचक और जरासंध ने द्रौपदी के मान को भंग करने का प्रयास भी किया लेकिन द्रौपदी ने विषम परिस्थिति में संयम का पालन किया और अपने सतीत्व की रक्षा की।
लेकिन सवाल उठता है कि शक्तिशाली राजा द्रुपद ने पांच पुरूषों के साथ अपनी पुत्री का विवाह करना कैसे स्वीकार किया। इस संदर्भ में कथा है कि महर्षि व्यास ने महाराज द्रुपद को बताया कि दिव्य दृष्टि देकर पांचों पुरूषों यानी पांचों पाण्डवों के पूर्व जन्म का ज्ञान कराया।
द्रुपद ने जाना कि पांचों पाण्डव असल में पांच इन्द्र हैं जो देवताओं के कार्य को पूरा करने के लिए प्रकट हुए हैं। द्रौपदी स्वर्ग की लक्ष्मी हैं जिनका विवाह ब्रह्मा जी ने पांचों पाण्डवों से निश्चित किया है। इस सत्य को जानकर द्रुपद ने पांचों पाण्डवों के साथ द्रौपदी का विवाह कर दिया।