राजा की कहानी, जिसे उसके गुरु ने बताया कि बेटे को उसके अपने अनुभवों से खुद सीखने देना चाहिए।
एक राजा था, जिसका नाम रतन सिंह था। वह लोगों को मुसीबतों से बचाने की कोशिश करता था। इस कारण प्रजा उसकी बहुत इज्जत करती थी। राज्य के लोग मिल-जुलकर रहते थे। कुछ साल बाद रतन सिंह को एक बेटा हुआ। रतन सिंह बहुत खुश हुआ। पूरे राज्य में खुशी का माहौल छा गया। रतन सिंह ने अपने बेटे को बहुत लाड़-प्यार से पाल-पोसकर बड़ा किया।
उसे अपने बेटे पर गर्व था, क्योंकि वह उसका इकलौता बेटा था। लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होने लगा, राज्य का माहौल बदलने लगा। रतन सिंह हमेशा चाहता था कि उसका बेटा उसकी तरह बने। उसका बेटा हालांकि बहुत समझदार था, पर रतन सिंह को उसके भविष्य की चिंता लगी रहती थी। वह बार-बार उसे अपने अनुभव बताता रहता। लेकिन उसका बेटा वही करता, जो उसका दिल चाहता। रतन सिंह हमेशा अपने बेटे को बुरे लोगों और बुरे अनुभवों से बचाने की कोशिश करता।
लेकिन उसका बेटा अक्सर अपने पिता के विपरीत रास्तों पर चलता। इस कारण राजा क्रोधित रहने लगा। रतन सिंह का गुस्सा धीरे-धीरे पूरे राज्य को दिखाई देने लगा। वह किसी पर भी भड़क जाता। कई बार तो वह भरी सभा में अपने बेटे को छोटी-छोटी बातों पर खूब फटकारता। एक तरफ रतन सिंह का डर लोगों में फैल रहा था, दूसरी तरफ उसके बेटे के प्रति लोगों में प्यार और इज्जत बढ़ती जा रही थी। लोगों में अपने प्रति डर देख कर रतन सिंह और भी ज्यादा चिंतित रहता।
कुछ ही दिनों में रतन सिंह एकदम अकेला महसूस करने लगा। अंत में वह अपने गुरु के पास गया और उन्हें उसने अपनी सारी व्यथा बताई। गुरु बोले, तुम अपने बेटे को बहुत चाहते हो। लेकिन तुम चाहकर भी उसे उसके अनुभवों से नहीं बचा सकते। तुम्हारे अनुभव उसके लिए प्रेरणा तो हो सकते हैं, लेकिन सबक नहीं। जिस दिन तुम उसके प्रति अपनी अपेक्षाएं खत्म कर दोगे, उस दिन तुम खुद को और उसको इस स्थिति से आजाद कर पाओगे।