चारों ओर प्रकाश व्याप्त होने पर भी व्यक्ति अन्धकार का रोना रो सकता है और अन्धेरा-अन्धेरा चीखता-चिल्लाता रह सकता है। इसके मात्र दो ही कारण हो सकते हैं। एक तो यह कि व्यक्ति किसी तंग कोठरी में चारों ओर से बन्द दरवाजों और खिड़कियों के भीतर बन्द हो। उस स्थिति में बाहरी प्रकाश की, सूर्य देवता की एक भी किरण उस तक नहीं पहुंच सकती। दूसरा कारण व्यक्ति का दृष्टिहीन होना हो सकता है। इन दो कारणों को छोड़कर तीसरा कोई कारण नहीं है कि व्यक्ति अन्धकार से दुःखी और सन्तप्त रहे।
मनुष्य के जीवन में भी इसी प्रकार दुःख और वेदना का कोई अस्तित्व नहीं है। अंधकार एक नकारात्मक सत्ता है, प्रकाश का अभाव है। यह प्रकाश कई बार परिस्थितियों के कारण भी लुप्त हो जाता है, किन्तु वैसी स्थिति में परमात्मा ने मनुष्य को वैसी क्षमता दे रखी है कि वह उनका उपयोग कर प्रकाश के अभाव को दूर कर सके।
लेकिन अंधकार को देख-देख कर ही जिसे भयभीत होते रहना हो, संतप्त और दुःखी रहना हो, तो उसके लिए अंधकार से मुक्त होने का कोई उपाय नहीं है। दुःख भी अंधकार के समान नकारात्मक भाव है। उसका कोई अस्तित्व नहीं है। व्यक्ति अपनी भ्रान्तियों, गलतियों और त्रुटियों की तंग कोठरी में बंद होकर चारों ओर खिले हुए सुख तथा आनंद से वंचित रहे, तो इसमें परमात्मा का कोई दोष नहीं है।
उसने तो सृष्टि में चारों ओर सुख, आनन्द तथा प्रफुल्लता का प्रकाश बिखेर रखा है। अपनी भ्रान्तियों और त्रुटियों की दीवारों में, समझ और दर्शन के दरवाजों, खिड़कियों को बन्द कर कृत्रिम रूप से अन्धकार पैदा किया जा सकता है। प्रायः जो दुःखी, संतप्त, व्यथित और वेदनाकुल दिखाई देते हैं, उनकी पीड़ा के लिए बाहरी कारण नहीं, अपनी संकीर्णता की दीवारें उनके लिए उत्तरदायी हैं।
परिस्थितिवश कोई समस्या या कठिनाई उत्पन्न हो जाय, तो उसके लिए भी शोध करना आवश्यक नहीं है। परमात्मा ने अन्धकार को दूर भगाने की तरह मनुष्य को उन समस्याओं तथा कठिनाइयों को सुलझाने की क्षमता दे रखी है। वह उस क्षमता का उपयोग कर अपने लिए सुख तथा आनन्द का मार्ग खोज सकता है तथा दुःख रूपी अंधकार को दूर हटा सकता है।