जब हम शब्दों की शुद्धता को अनुभव करते है तो हम जीवन की गहराई को अनुभव करते हैं और जीवन जीना आरंभ कर देते हैं। हम सुबह से रात तक शब्दों को ही जीते हैं। हम इनके पीछे के उद्देश्यों को खोजने में और उद्देश्यता को खोजने में सारे उद्देश्य भूल जाते हैं। यह इतना गंभीर हो जाता है कि हम अपनी रातों की नींद ही खो बैठते हैं।
हम रात भर उन शब्दों के कारण परेशान हो जाते हैं। बहुत से लोग रात को सोते समय भी बोलते हैं। यहां पर शब्दों से आराम नही मिल पाता। शब्द ही सभी प्रकार की चिंताओं की जड़ है। बिना शब्दों के तो आप चिंतित ही नही हो सकते। आपकी मित्रता शब्दों की ही देन है। कोई कहता है, ‘‘ओह, आप कितने महान है, आप कितने सुंदर है, आप कितने दयालु हैं; मैंने अपने जीवन में आप जैसा व्यक्ति नही देखा। मैं पूरे जीवन आप जैसे व्यक्ति को खोज रहा था।"
अचानक आप में प्रेम जागृत हो जाता है। और जब कोई व्यक्ति हमसे गलत शब्दों में बात करता है तो हम दुखी हो जाते हैं। लेकिन वे तो शब्द मात्र है। जीवन बहुत ही सतही हो जाता है, जब हम जीवन को शब्दों पर जीते हैं। जो कुछ भी जीवन में महत्वपूर्ण है, सार युक्त है वह तो शब्दों में व्यक्त ही नही किया जा सकता।
प्रेम का अनुभव, सही कृतज्ञता शब्दों में व्यक्त नही हो सकता। वास्तविक सौंदर्य और सच्ची मित्रता में शब्द नही होते। क्या हम उस व्यक्ति के साथ जिस से हम प्रेम करते है, कुछ देर मौन में बैठे हैं? क्या आपको याद आता है कि आप किसी के साथ बैठकर चुपचाप कार चला रहे हो, या सूर्यास्त को देख कर या सौंदर्य को देख कर, पहाड़ो को देखकर चुप रहे हो? नही, हम अपना मुंह खोल देते हैं।
हम बातें करना आरंभ कर देते है और जो सौंदर्य है उसको समाप्त कर देते हैं। हम पिकनिक मनाने जाये और वहां पर सौंदर्य देख कर भी बातें करते रहें। कार चला रहे हों तब देखो हम कितनी बाते करते हैं। उस में चार व्यक्ति होते हैं और दो प्रकार की बातचीत चल रही होती है। कभी कभार सभी बातें करने लगते हैं।
कोई एक दूसरे को समझ ही नही रहा होता है। हम अपने मन को शोर से भर लेते हैं। जितना क्रोध अंदर होता है उतना ही कठोर संगीत बाहर हम चलाते हैं क्योंकि ऐसा करना हमे राहत देता है। जितनी शुद्ध हमारी चेतना होती है, जितने हम तनावमुक्त होते है उतना ही हम संगीत के प्रति संवेदनशील होते हैं।
आपकी उपस्थिति ही बता देती है कि आप क्या है। एक महान संत प्रेम पर अपना प्रवचन दे देगा और आपको वह अनुभव ही नही होगा। यदि आप वहीं पर हो और प्रेम में हो तो आपको सब पता चलेगा। अपने भीतर बैठे, ध्यान करे, कुछ देर मौन में रहें और अनुभव करें कि आप प्रेम में है। आप जिस तत्व के बने है उसे प्रेम कहते हैं।
शब्दों के परे ही प्रेम है। सहज रहें, अबोध रहें और आप देखेंगे कि प्रेम की शक्ति से सारे काम स्वतः ही हो जाते हैं। आप जहां भी सौंदर्य देखे, वहां ही उसकी पूजा करें और सबकुछ उसी को समर्पित कर दें। यदि हम सौंदर्य को समर्पित नही करते हैं तो हम उसे अपने पास रखना चाहते हैं। जो कुछ भी हम समर्पित करना चाहते हैं उसे अपने पास रखना भी नही चाहते। हम उसे अपने पास रख ही नही सकते।
हर सौंदर्य से बड़ा सौंदर्य है, ईश्वर। जब आप सौंदर्य की उपासना करते है तो उसे अपने पास रखने का भाव अपने आप ही समाप्त हो जाता है। हम मौन में वार्तालाप कर सकते हैं। हम ह्दय से भी वार्तालाप कर सकते हैं। भीतर के मौन से हम पक्षियों का गीत और उनके मध्य के समय को सुन सकते हैं। यह एकदम पूर्ण और संगीत भरा हैं। यह रचना की अनुपम घटना है।
एक पक्षी एक लय में बिना ढोलक और बीट्स के गा सकता है। हमें उसके गाने के लिये इतना धैर्य और समय की आवश्यकता नही है। दिव्य संगीत हमारे शरीर में सदैव ही चल रहा है। हम उसके प्रति सजग नही है। हम अपने भीतर के उस मौन से दूर रहकर हमारे जीवन के उस सौंदर्य से भी दूर रह रहे हैं।
हर व्यक्ति एक तरफ खड़ा होकर महज 10 मिनट तक आकाश की ओर देखे। तारों की ओर देखे। गुलाब की ओर देखे। ऐसा मत कहो, ‘‘यह गुलाब खूबसूरत है; यह गुलाब या वह गुलाब ज्यादा बड़ा है। ‘‘ये है बस इतना ही! यही बहुत कुछ है जीवन में। जब हमें पता चलेगा की शब्द अपूर्ण है तब हम जीवन की गहराई को समझ सकेंगें। हम अपने जीवन की गहराई में बढ़ जाएंगे।
स्रोतः आर्ट
ऑफ लिविंग
श्री श्री रविशंकर परिचय
मानवीय मूल्यवादी, शांतीदूत और आर्ट
ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के
पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए
इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में
से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों
का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास
लेने की तकनीक) की खोज की।