एक बार एक सेठ ने अपने फार्म हाऊस में पार्टी रखी। काफ़ी मेहमान आए। फार्म हाऊस के स्विमिंग पूल में कुछ मगरमच्छ भी थे। सेठ ने स्टेज पर खड़े हो कर एक ऐलान किया कि जो भी इस स्विमिंग पूल को तैर कर पार करेगा उसको एक करोड़ रुपए इनाम दिया जाएगा। सभी लोग एकदम पीछे हट गए। कोई भी पैसों के खातिर अपनी जान गंवाना नहीं चाहता था। तभी एक व्यक्ति उस स्विमिंग पूल में कूद गया है। किसी तरह अपने आप को संभाल कर दाएं बायें तैर कर वह दूसरे छोर पर पहुंच गया।
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सब लोगों ने उसके साहस की बहुत प्रशंसा की और कहा कि वाह, तुम एक करोड़ रुपए जीत गए। उस व्यक्ति ने अपने गीले बाल सुखाते हुए कहा, यह तो ठीक है कि मुझे एक करोड़ रुपए मिलेंगे, लेकिन पहले यह बताओ कि मुझे धक्का किसने दिया था?
यही बात हमारे साथ है। हम इस संसार रूपी समुद्र में कैसे आए पता नहीं, परंतु आ गए तो निकलना ज़रूर सीखना पड़ेगा। गीता ध्यानम् में एक श्लोक आता है जिसमें कवि ने कहा है। अर्थात इस संसार रूपी रणनदी,जो मगरमच्छ, शार्क इत्यादि से भरी हुई है, उससे केवल मात्र भगवान ही आपको पार करा सकते हैं। समस्या यह है कि हमें समस्या में आना तो आता है परंतु निकलना नहीं आता।
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मात्र यह कहने से कि प्रभु हमें भवसागर से पार करा देंगे, कुछ नहीं होने वाला। सबसे पहले प्रयास करना पड़ेगा। डाक्टर की दवाई आपको बीमारी से मुक्त कर देगी, लेकिन पहले आपको डाक्टर के सामने समर्पण करना होगा। डाक्टर द्वारा बताए परहेजों को अंगीकार करना होगा। तभी बीमारी रूपी भवसागर से पार हो पाओगे। शास्त्रों ने जो गुर बताए हैं उसको समझने का प्रयास करते हैं।
भगवान राम जी ने शबरी को नवधा भक्ति के रूप में ये गुर दिए हैं- पहला संतों का संग दूसरा कथा प्रसंग का संग तीसरा गुरू संग चौथा कीर्तन संग पांचवां संयम का संग छठा मंत्रों का संग सातवां संसार ही भगवान है आठवां संतुष्टि और दूसरे का दोष न देखना नौवां छलकपट के बिना प्रभु के भरोसे जीना।
ये नौ कदम अलग-अलग नहीं लेने। जैसे स्वैटर का एक धागा भी पकड़ में आ जाए तो पूरा स्वैटर उधड़ जाता है। ज्ञान के कुछ क़दम आपको गहरे दु:खों के सागर में मगरमच्छ और शार्क से बचा कर पार ले जाएंगे।