आध्यात्म की आवश्यकता रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही सबसे अधिक है। हिमालय की कंदराओं में बैठने वालों को आध्यात्म की कोई ज़रूरत नहीं है। जो बाज़ार में जाएगा उसे ही तो पैसे की ज़रूरत पड़ेगी। मरुभूमि में पैसे ले जाने की ज़रूरत है। रोज़मर्रा की जिंदगी में तरह-तरह के लोगों से मिलना पड़ता है। ज़िम्मेदारियाँ उठानी पड़ती हैं। ऐसे में आध्यात्म का बल बहुत ज़रूरी है।
अध्यात्म के बिना व्यक्ति टूट जाता है। आध्यात्म के बिना धर्म नहीं रह जाता इसलिए व्यक्ति के लिए अध्यात्म जरूरी है। समाज में परिस्थितियों का सामना करने के लिए अध्यात्म अनुकूलन क्षमता देता है। आध्यात्म से जीवन आसान हो जाता है। समाज में समरसता बनाए रखने के लिए भी अध्यात्म की आवश्यकता है।
आध्यात्म व्यक्ति को संसार की परिस्थितियों से जीत दिलाता है और जीवन के अंतिम लक्ष्य तक पहुंचा देता है। रोजमर्रा की जरूरत में आध्यात्म के प्रयोग के लिए थोड़ा सीखना पड़ता है। इसके लिए योग, ध्यान और प्रायाणाम करना पड़ता है। सत्संग और भजन करें, योग वशिष्ठ, अष्टावक्र गीता, भगवद् गीता और महात्मा बुद्ध की वाणी पढ़ें, इससे काफ़ी ज्ञान मिलता है और अध्यात्मिक सुख भी प्राप्त होता है।
श्री श्री रविशंकरपरिचय
मानवीय मूल्य्वादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।