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श्राद्ध में पितरों का जल से तर्पण क्यों किया जाता है?

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सोमवार 28 सितंबर से पितृपक्ष शुरु हो चुका है। इसके साथ ही पितरगण परलोक से धरती पर आ चुके हैं और अपनी संतानों से श्राद्ध और तर्पण की चाहत लगाए हुए खड़े हैं, ऐसा शास्त्रों का मत है। शास्त्र कहता है कि पितृपक्ष में परलोक गए व्यक्ति की आत्मा धरती पर आती है और श्राद्ध एवं तर्पण की इच्छा रखती है।
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गरुड़ पुराण में बताया गया है कि श्राद्ध और तर्पण से ही पितरों को संतुष्टि मिलती है और उनकी आत्मा को सद्गति मिलती है। इसलिए श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है।

तर्पण में जल से पितरों की पूजा होती है। गायत्री परिवार के प्रमुख श्रीराम शर्मा आचार्य तर्पण में जल के प्रयोग के बारे में क्या कहते हैं आइये जानें।
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इसे ही ‘तर्पण’ कहते हैं

शरीर को उन्हीं ने पाला पोसा बड़ा किया और योग्य बनाया। उन्हीं के प्रभाव से हम इस योग्य बन सके हैं। इसलिए पितृ ऋण को प्रमुखता देते हुए उन्हें याद रखने के लिए तर्पण दिया जाता है। श्रद्धाँजलि पूजा उपचार का सरलतम प्रयोग है अन्य उपचारों में वस्तुओं की जरूरत पड़ती है।

वे कभी उपलब्ध होती हैं कभी नहीं। किन्तु जल ऐसी वस्तु है जिसे हम दैनिक जीवन में अनिवार्यतः प्रयोग करते हैं। वह हर जगह मिल भी जाता है। इसलिए जलांजलि को सरल सुलभ माना गया है। इसलिए सूर्य नारायण को अर्घ, तुलसी वृक्ष में जलदान, अतिथियों को अर्घ तथा पितर गणों को तर्पण का विधान है।

तर्पण की पितरों को आवश्यकता है या नहीं, यह केवल अपनी भावना है। शास्त्रीय भाषा में इसे ही ‘तर्पण’ कहते हैं। पितृ ऋण को चुकाने के लिए दूसरा कृत्य आता है,‘श्राद्ध’। इसका प्रचलित रूप तो ‘ब्राह्मण भोजन’ मात्र रह गया है पर बात ऐसी है नहीं। अपने साधनों का एक अंश पितृ प्रयोजनों के निमित्त ऐसे कार्यों में लगाया जाना चाहिए जिससे लोक कल्याण का प्रयोजन भी सधता हो।
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प‌ितरों की खुशी के ल‌िए ब्राह्मण भोजन से भी अच्छा है यह

वृक्षारोपण ऐसा कार्य है जिसे ब्रह्मभोज से भी कहीं अधिक महत्व का माना जा सके। किसी व्यक्ति को भोजन करा देने से उसकी एक समय की भूख बुझती है। इस कृत्य से मात्र लकीर पिटने जैसी चिन्ह पूजा ही होती है। अच्छा यह है कि श्राद्ध रूप में ऐसे वृक्ष लगाएं जाएं जो किसी न किसी रूप में प्राणियों की आवश्यकता पूरी करते हों।

अपने पास कृषि योग्य भूमि से थोड़ी भी जमीन बचती हो, कम उपयोगी हो तो उसमें आम, पीपल, महुआ आदि के वृक्ष लगा देने चाहिए। बेर, अमरूद तो और भी कम जगह में लग सकते हैं।

मन्दिर धर्मशाला तो कोई धनी मानी ही बना पाते हैं। लेकिन उद्यान और जलाशय बनाने, साफ सफाई करने का काम ऐसा है जिसे अपने मित्र पड़ोसियों के साथ मिल-जुलकर पूरा किया जा सकता है।

साथ ही उनसे किसी न किसी रूप में लाभ भी उठाया जा सकता है। इस प्रकार के उपयोगी काम वे भी कर सकते हैं जो धन खर्च करने की स्थिति में तो नहीं है, पर जो शरीर से स्वस्थ हैं। श्रमदान के रूप में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने की स्थिति में तो हैं ही।
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