बहुत से लोगों की चाहत रहती है कि अंतिम सांस गंगा तट पर लें। इसलिए वृद्घावस्था में गंगा तट पर घर बनाकर रहने लगते हैं। अगर ऐसा संभव नहीं हो पाता है तो अपने बच्चों से यही उम्मीद लगाए रखते हैं कि अंतिम संस्कार गंगा किनारे हो या उनकी अस्थियां गंगा में विसर्जित की जाए।
माना जाता है कि गंगा में अस्थियां विसर्जित करने से एवं गंगा किनारे प्राण त्याग करने से यमलोक में प्राप्त होने वाले कष्टों से मुक्ति मिलती है और स्वर्ग में स्थान मिलता है। इस मान्यता का कारण यह है कि शास्त्रों में गंगा को स्वर्ग की नदी कहा गया है। गंगा को त्रिपथगा भी कहते हैं क्योंकि गंगा एक मात्र नदी है जो तीनों लोको यानी स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में भी बहती है।
कपिल मुनि के शाप के कारण भष्म हुए राजा सगर के पुत्रों को मुक्ति दिलाने के लिए राजा भगीरथ ने कठोर तपस्या की थी। इससे गंगा को पृथ्वी पर आना पड़ा था। गंगा के स्पर्श मात्र से सगर के पुत्र पाप और शाप मुक्त होकर स्वर्ग चले गए। महाभारत में भी गंगा को मुक्ति दायिनी बताया गया है।
राजा वशिष्ठ के शाप से मुक्ति पाने के लिए सातों वसुओं ने गंगा से प्रार्थना की। गंगा ने राजा शांतनु से विवाह करके सातों वसुओं को जन्म दिया और अपनी जल धार में बहा दिया जिससे उन्हें मुक्ति मिल गई। इसलिए व्यक्ति यही चाहता है कि गंगा का स्पर्श प्राप्त करके उसे भी मुक्ति मिल जाए। इसलिए गंगा के किनारे श्राद्घ, तर्पण एवं अंतिम संस्कार के लोग श्रद्घालु जुटते हैं।