मनुष्य कितनी भी मेहनत कर ले, परंतु उसे अपने पर भरोसा नहीं
है तो वह सफल नहीं हो सकता। अपने पर जिसे विश्वास रहता है उसे अंदर से ही अलौकिक
शक्ति का बल मिलता है। जन्म से ही कोई महान अथवा गुणवान पैदा नहीं होता, लेकिन
दृढ़तापूर्वक अभ्यास से हरेक व्यक्ति अपने में गुण पैदा कर सकता है।
बहुत
से विचारक ऐसे हुए हैं जिन्हें बचपन में बहुत डर लगता था, परंतु अच्छे संगत विचारों
से उनमें आत्मविश्वास जागा और वे ऐसे निडर बने कि दुनिया की कोई ताकत उन्हें नहीं
डरा सकी। मनुष्य का मन चंचल है इसलिए बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती। बिना बुद्धि स्थिर
हुए आत्मविश्वास नहीं हो सकता। इसलिए सत्पुरुषों की संगत अति आवश्यक है। अस्थिर
बुद्धि वाला व्यक्ति सूखी पत्ती की तरह हवा में उडऩे वाला, सदैव दूसरों पर ही
निर्भर रहता है। परंतु जिसकी अपनी मजबूती होती है वह अपने बल पर चलता है।
आत्मविश्वास पर खड़ा किया गया भवन हमेशा सुरक्षित रहता है।
नि:संदेह
आत्मविश्वास अनेकों रोगों की दवा है, जहां व्यक्ति अनेक प्रकार की भूत-भविष्य की
चिंताओं में घुटता रहता है। और परिश्रम से जी चुराता है, वहीं आत्मविश्वासी को किसी
प्रकार की असफलता का मुंह नहीं देखना पड़ता। एक राजा पर किसी दुश्मन राजा ने चढ़ाई
कर दी। राजा ने उसका मुकाबला किया। लेकिन हार गया। अपने प्राण बचाने के लिए जंगल
में एक गुफा में शरण ली। जब राजा छिपकर बैठा था तो उसने देखा कि एक कीड़ा दीवार में
चढ़ने की कोशिश करता है, परंतु गिर जाता है।
राजा उसी कीड़े के प्रयास को
देखता रहा कई बार वह गिरा, परंतु कीड़े का प्रयास बराबर जारी रहा और अंत में उसे
सफलता मिली। राजा सोचने गला कि इस छोटे से कीड़े ने हिम्मत नहीं हारी और आखिर दीवार
पर चढऩे में उसे सफलता मिल ही गई। उससे राजा को प्रेरणा मिली, भीतर का विवेक जागा
और उसने सोचा जब इस कीड़े को सफलता मिली तो मैं तो मानव हूं। कोशिश करूं तो अवश्य
मेरी भी जीत होगी। वह गुफा से बाहर निकला। उसने बिखरी सेना को एकत्रित किया और
सैनिकों में भी आत्मविश्वास जगाया तथा अपना खोया हुआ राज्य पुन: हासिल कर
लिया।
बहुत से व्यक्ति आत्म-विश्वास को घमंड मानते हैं। यह सरासर गलत है।
आत्मविश्वास गुण है- जो आदमी को धीरज प्रदान करता है। घमंड दुर्गुण है- वह आदमी को
गिराता है। घमंड व्यक्ति का दुश्मन है, आत्मविश्वास सच्चा मित्र है।
साभारः परमहंस दाती जी महाराज
दाती जी महाराज परिचय
दाती
जी महाराज का जन्म 10 जुलाई 1950 को राजस्थान के पाली जिला में अलावास
गांव में हुआ। दाती जी महाराज बचपन से ही तीक्ष्ण बुद्घि के स्वामी थे।
बाल्यकाल में ही इनका लगाव ईश्वर से हो गया था। इन्होंने संसार में व्याप्त
ज्योतिष, ध्यान और शनि संबंधित भ्रांतियों को दूर करने का विचार किया।
इनकी विद्या, ज्ञान और कृपा से बहुत से भक्त लाभ प्राप्त कर रहे हैं। दाती
जी के तीन प्रमुख सिद्घांत हैं सेवा, सतसंग और सुमिरन।